बग़ावत और मुहब्बत का सागर थे राहत इंदौरी


केवल कृष्ण पनगोत्रा
बग़ावत और मुहब्बत का एक सागर देखते ही नजरों से दूर हो गया! 
मुहब्बत वालों से मुहब्बत, मगर फिरका परस्तों से बग़ावत सिखा गया!!
मरहूम राहत इंदोरी साहिब के लिए मेरे पास इससे माकूल अल्फाज नहीं हो सकते। 11 अगस्त 2020, मंगल का रोज़ एक ऐसी खबर लेकर आया जिसने पूरी दुनिया में शायरी के शौक़ीनों और हुकमरानों को एक गहरा सदमा दे दिया कि उन्हें चेताने वाला शायरी का बेताज बादशाह अचानक कहां चला गया।

जीवन परिचय :
जैसा कि नाम से जाहिर है, इंदौरी जी का जन्म मध्य प्रदेश स्थित इंदौर के एक कपड़ा मिल कर्मचारी के घर हुआ था। वह परिवार में भाई बहनों में वह चौथे स्थान पर थे। उन्होंने 19 साल की उम्र में अपनी पहली नज़म को खुले में पढ़ा था। स्कूल और कॉलेज के दौरान वह काफी जहीन विद्यार्थी थे, और खेल में भी दिलचस्पी रखते थे।
वर्ष 1973 में बी. ए पास करने के बाद,अगले दस साल उन्होंने आवारगी में बिताए क्योंकि वह यह फैसला नहीं ले पा रहे थे कि जीवन में क्या किया जाए। बाद में उन्होंने उर्दू साहित्य में एम. ए भी किया और देवी अहिल्या विश्वविद्याल इंदौर में शिक्षण का काम भी किया। उन्होंने उर्दू साहित्य में पीएच.डी. की और उर्दू साहित्य के प्रोफेसर के रूप में वहां पढ़ाने का काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां 16 वर्षों तक शिक्षण किया। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने पीएचडी की।
कविता क्षेत्र में आने से पहले, वह एक चित्रकार बनना चाहते थे और जिसके लिए उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर पेंटिंग करना भी शुरू कर दिया था। इस दौरान वह बॉलीवुड फिल्म के पोस्टर और बैनर को चित्रित करते थे। वह जिंदगी के आखिरी दिनों तक भी पुस्तकों के कवर को डिजाइन करते थे। इंदौरी ने अपनी शायरी और गजलों से जहां कई सरकारों को चेताया तो बॉलीवुड की कई फिल्मों में गाने भी लिखे हैं। राहत ने करीब एक दर्जन किताबें लिखीं और हाल ही में उनकी बायोग्राफी भी रिलीज़ हुई थी।
उनके गीतों को 11 से अधिक ब्लॉकबस्टर बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किया गया। जिसमें से मुन्ना भाई एमबीबीएस एक है।
वह एक सरल और स्पष्ट भाषा में कविता लिखते थे। वह अपनी शायरी की नज़्मों को एक खास शैली में पेश करते थे।
जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो,
मोहब्बत करने वाला जा रहा है।

दोस्ती जब किसी से की जाए,
दुश्मनों की भी राय ली जाए।

इंदौरी साहिब की वतन परस्ती और बाग़ी कौल:

सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।

मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना

इंदौरी साहिब अपनी शायरी के बलबूते हमेशा अमर रहेंगे। उनके इस शायराना कौल से तो यही लगता है कि वह अपनी श्रद्धांजलि के वसीले अपनी कलम से ही कर गए हैं, जैसे :
अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे

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