हम मंदिरों को देवी-देवताओं के ही नाम से जानते हैं, मंदिरों की वास्तुकला और उनकी परंपराएं बहुत व्यापक हैं


रवीश कुमार 
शिव मंदिर, दुर्गा मंदिर, काली मंदिर या राम मंदिर। हम मंदिरों को देवी-देवताओं के ही नाम से जानते हैं। मंदिरों की वास्तुकला और उनकी परंपराएं बहुत व्यापक हैं। इतिहासकारों ने इस पर कई किताबें लिखी हैं। कश्मीर के शिव मंदिर से लेकर औरंगाबाद का कैलाशनाथ मंदिर। सिर्फ देवताओं की कहानी नहीं कहते हैं। मंदिर बनाने की तय विधियां हैं।
यहां तक कि किस भूमि में मंदिर बनेगा इस पर भी कई तरह के सूत्र मिलेंगे। अब तो लोग अतिक्रमण कर या कब्ज़ा कर मंदिर बना लेते हैं। उन्नाव में थाने की ज़मीन कब्ज़ा कर मंदिर बन रहा था। बकायदा लोग उसके लिए धरना दे रहे थे। तो ख़ैर ये सब चलता रहता है लेकिन आप मंदिरों के इतिहास और उनकी वास्तुकला को जानना चाहते हैं तो एक पूरा जीवन निकल सकता है या जीवन के कई साल निकल सकते हैं।
मंदिरों के कई प्रकार के समूह होते हैं। आकार के हिसाब से उन्हें समूहों में बांटा गया है। वैराज्य समूह के मंदिर वर्गाकार होते हैं। पुष्पक समूह के मंदिर आयताकार होते हैं। कैलाश समूह के वृत्ताकार और मणिक समूह के मंदिर अंडाकार। त्रिविश्टिम समूह के मंदिर अष्टकोणीय होते हैं।
मंदिरों के नाम भी होते हैं। जो देवी-देवताओं के नाम से अलग होते हैं। मेरू, मंदर, विमान, नन्दीवर्धन, नन्दन, सर्वतोभद्र, भद्र, रूचक, वामन, वलभी, गृहराज, ब्रह्म मंदिर, भाला, शिविका, विशाला, भुवन, प्रभव, पद्म, महापद्म, वलय, श्री वृक्ष, गज, वृश हंस, गरुड़, ऋक्ष, भूधर, श्रीपद, पृश्वीधर।
इसके अलावा हम इन्हें बौद्ध शैली, नागर शैली, द्रविड़ शैली, मथुरा शैली में भी बांटते हैं। कभी कोणार्क जाएं तो सूर्य मंदिर ज़रूर देखिए। इसकी भव्यता अद्भुत है। विहंगम।
ऐसा नहीं है कि इसकी उपेक्षा हुई है। आपके पास वक्त नहीं मिला कभी पढ़ने का और आप सारी चीज़ें जीवन में पढ़ भी नहीं सकते हैं। इतिहासकारों ने वर्षों लगाकार काम किया है और किताबें लिखी हैं।

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