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Article: हाथी नहीं गणेश है, ब्राह्मण विष्णु महेश है’ के फार्मूले पर मायावती

  ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी विधानसभा जायेगा सुरेश गांधी भले ही विधानसंभा चुनाव 2022 में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी हो, लेकिन पार्टिया...

 

ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी विधानसभा जायेगा

सुरेश गांधी

भले ही विधानसंभा चुनाव 2022 में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी हो, लेकिन पार्टियां इसकी तैयारी में अभी से जुट गई हैं। भाजपा जय-जय सियाराम के बीच श्रीराम जन्मभिम मंदिर का शिलांन्यास कर हर वर्ग को पार्टी से जोड़ने की मुहिम तेज कर दी है, तो ऐसे में सपा-बसपा कहा पिछड़े। एक तरफ सपा ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए परशुराम की सबसे ऊंची मूर्ति लगाने की बात कर रही है, तो बसपा ने एक बार फिर 2007 की सोशल इंजिनियरिंग को धार देने में जुट गयी है। मतलब साफ है कि, 2022 के चुनाव में ‘‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी विधानसभा जायेगा’’, ‘‘हाथी नहीं गणेश है, ब्राह्मण विष्णु महेश है’’ जैसे 13 साल पुराने नारों की गूंज सुनाई देगी। इसके लिए तो पहले चरण में ही मायावती ने पार्टी नेता सतीश चंद्र मिश्रा को अगड़ी जाति के मतदाताओं (खासकर ब्राह्मण) के बीच पार्टी को विस्तार करने की कमान सौंप दी है। इसमें पूर्वांचल की जिम्मेदारी मायावती के बेहद करीबी रहे महेंद्रनाथ पांडेय को सौपी है।

सुरेश गांधी

 फिरहाल, बसपा सुप्रीमों मायावती ने 2022 के विधानसभा चुनाव का ताना-बाना बुनना शुरु कर दी है। इसमें वो साल 2007 के सोशल इंजिनियंरिंग को ज्यादा तरजीह देने की रणनीति बनाई है। पहले चरण में उन्होंने ब्राह्मण समाज की आस्था के प्रतीक परशुराम के नाम पर हर जिले में अस्पताल बनाने और ठहरने की सुविधाओं का निर्माण करने का वादा किया है। लगे हाथ अखिलेश की झूठे ब्राह्मण प्रेम का खुलासा करते हुए कहा कि, वे अपने कार्यकाल में अनेक जनहित योजनाएं सहित जिलों के नाम संत व महापुरुषों के नाम रखी थी, लेकिन सपा सरकार ने जातिवादी मानसिकता और द्वेष की भावना के चलते बदल दिया था। बसपा की सरकार बनते ही इन्हें फिर से बहाल किया जाएगा। दरअसल, 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती इसी सोशल इंजीनियरिंग के बूते सत्ता में आईं थीं। वहीं, 2012 के चुनावों में अगड़ी जाति के मतदाताओं की नाराजगी मायावती की हार का अहम कारण बनी थी। लेकिन अब दुबारा उसे इस कारण को नहीं बनने देना चाहती।

    यही वजह है कि, पिछड़ी जातियों से साथ इस बार वे अगड़ी जाति खासकर ब्राह्णों को अभी से रिझाने में जुट गयी है। इसके लिए 2022 के चुनाव से पहले तक पूरे सूबे में सम्मेलन से लेकर अन्य कार्यक्रमों की न सिर्फ रुपरेखा तैयार कर चुकी है बल्कि इसे धरातल पर उतारने के साथ बूथ लेबर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तय कर दी है। इसकी कमान उनके नजदीकी रहे सतीश चंद्र मिश्रा को सौंपी गयी है।    

      पूर्वांचल की कमान मायावती के साथ साएं की तरह रहने वाले महेंद्रनाथ पांडेय को मिली है।   इसमें सोनभद्र मिर्जापुर-भदोही रंगनाथ मिश्रा के हाथ होगी। खास बात यह है कि, पहले दौर में महेंद्रनाथ पांडेय ने वाराणसी सहित पूर्वांचल के कई जिलों में भाजपा से नाराज चल रहे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी से जोड़ते हुए मायावती से मिलाने का कार्यक्रम भी तय कर दी है। पूर्वांचल की कमान संभाल रहे महेन्द्र पांडेय की माने तो राज्य के कई हिस्सों में सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।

    आपको बता दें कि, सिर्फ सवा तीन फीसदी कम वोट पाने की वजह से यूपी गंवाने वाली बीएसपी फिर से दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की तैयारी में है। या यूं कहे जिस ’सोशल इंजीनियरिंग’ के फार्मूले का इस्तेमाल करके कभी बीएसपी अध्यक्षा मायावती ने उत्तर प्रदेश में 5 वर्ष सत्ता का सुख भोगा था, एक बार फिर से वो उसी पुराने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को झाड़ पोंछकर दांव लगा रही हैं।    हालांकि कहावत तो यही है कि, काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती। लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती की ताजा रणनीति देखकर लगता है कि, 2012 के विधानसभा चुनाव में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ बिखरने को वे किसी और ही चश्मे से देखती हैं। इस चुनाव में बुरी तरह मुंह की खाने के बाद मायावती अपने पारंपरिक दलित वोटरों की हौसला-अफजाई में लगी रहीं, और जब उन्हें लगा कि, अब अपना घर दुरुस्त हो गया है, तो उन्होंने अपने रणनीतिक ब्राह्मण एजेंडे को आगे बढ़ाया है। तभी तो दलित समाज के हितों की राजनीति करने वाली मायावती ने अपनी पार्टी के कुछ अहम पदों की जिम्मेदारी सवर्ण नेताओं को सौंपने का ऐलान किया है। उन्होंने पार्टी की भाईचारा समितियों को भंग कर दिया है, और इनके पदाधिकारियों को मूल संगठन में जगह दी है।

      भाईचारा कमेटियों में शामिल ब्राह्मण, ठाकुर, पिछड़े और मुस्लिम नेताओं को मंडल और सेक्टर स्तर के मूल संगठन में समायोजित कर दिया गया है। माना जा रहा है कि, 2022 विधानसभा के चुनाव में बसपा एक बार फिर बहुजन नहीं सर्वजन के नारे के साथ उतरेगी। यही वजह है कि, सवर्ण नेताओं को पार्टी का पदाधिकारी बनाकर ये साफ करने की कोशिश की है कि, पार्टी किसी एक जाति की न होकर सभी को समान प्रतिनिधित्व देने वाली है। पार्टी का मुख्य फोकस ब्राह्मण समाज पर है। लिहाजा पूर्व शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्रा को मिर्जापुर मंडल और महेन्द्रनाथ पांडेय को पूर्वांचल की जिम्मेदारी दी गई है।

      इसी तरह बाकी जोन और मंडल में भी उस इलाके के प्रभावशाली सवर्ण नेताओं को जिम्मेदारी देने की कार्यवाही जारी है। इन नेताओं की जिम्मेदारी ना सिर्फ ब्राह्मण समाज को बल्कि अपर कास्ट को भी पार्टी से जोड़ने की होगी। पिछले चुनावों में मुंह की खा चुकी पार्टी इस बार कुछ कमाल कर दिखाना चाहती है। ऐसे में मायावती को लगता है कि, ब्राह्मण समाज उनके लिए सत्ता की चाभी बन सकता है।

      काफी मंथन के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि, चुनावों में जीत का सही फार्मूला ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित (बीएमडी) ही हो सकता है।   क्योंकि इसी प्रयोग से वह 2007 में मुख्यमंत्री बनी थी। उस वक्त सतीश मिश्रा ने मायावती को ये फॉर्मूला सुझाया था। चूंकि यूपी में ओबीसी सपा का वोट बैंक माना जाता है, तो दलित बसपा का। ऐसे में कई बार ब्राह्मण वोट डिसाइडिंग फैक्टर हो जाते हैं, तो मायावती की नजर इसी निर्णायक वोट बैंक पर है। यही वजह है कि, बसपा अध्यक्ष मायावती एक बार फिर अपनी ’सोशल इंजीनियरिंग’ थ्योरी को आजमाने का मन बना रही हैं। माना जा रहा है कि, अनुसूचित जाति-मुसलमानों के अलावा सपा के साथ आने से ओबीसी वोट भी बसपा के खाते में जाएगा। वहीं ब्राह्मणों को तरजीह देने से बसपा को लगता है कि, उसे भाजपा और कांग्रेस पर बढ़त हासिल हो सकेगी।

     बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा को कर्मठ ब्राह्मण चेहरे के तौर पर देखा जाता है। वह 2007 से ही बसपा के लिए ब्राह्मण-अनुसूचित जाति के वोट को दोबारा एकजुट करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा के ब्राह्मण शंख बजाएंगे हाथी को विधानसभा पहुंचाएंगे।

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