बिहार और मालवा की अफ़ीम और मुंबई का ख़्वाब


Ravish Kumar
बिहार कई सदियों से मुंबई को सींच रहा है। मुंबई को ही नहीं उसके अफ़ीम किसानों के पसीने से पुर्तगाल, नीदरलैंड, चीन, ब्रिटेन, इंडोनेशिया तक अमीर हुए।
बिहार और उसके बाद मालवा की अफ़ीम से कमाए गए मुनाफ़े ने कंपनी राज और बाद में ब्रिटिश राज के दौर में ही भारतीय लोगों के हाथ में पैसा आया। पूँजी आई। अफ़ीम का मुनाफ़ा कई गुना होता था। कई पुराने पूँजीपतियों के इतिहास में जाएँगे तो अफ़ीम मिलेगी।
स्मगलिंग और अफ़ीम का सदियों पुराना रिश्ता रहा है। 1895 में जब रॉयल ओपियम कमिश्नर बना तब बिहार के किसानों ने कहा था कि अफ़ीम की खेती बंद करा दीजिए। इसमें बहुत मेहनत लगती है। मुनाफ़ा बहुत कम होता है। उसके बाद बिहार और पूर्वी यूपी के लोग अफ़ीम के पैसे पूँजीपति बने अमीरों के कारख़ाने में मज़दूर बन गए।
पहले दूर से बांबे को सींचते थे। अब बांबे जाकर सींचने लगे। उन किसानों और मज़दूरों की हाड़तोड़ मेहनत और अफ़ीम से कमाई पूँजी ने एक गाँव जैसे इलाक़े को महानगर में बदल दिया। जिसे आप बांबे कहते थे। जिसे आप मुंबई कहते हैं।

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