नशे की गिरफ्त में सिनेमा !


ध्रुव गुप्त 
जिस बॉलीवुड ने इस देश की कई-कई पीढ़ियों को ख़ुशी और ग़म, हंसी और आंसू, दर्द और राहत के जाने कितने अनमोल पल दिए, उस बॉलीवुड के लिए गटर का संबोधन सुनना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अच्छा नहीं लगा होगा।
मुझे भी नहीं लगा, लेकिन इस आरोप में कुछ सच्चाई तो है ही। पिछले दो दशकों में बॉलीवुड में प्रवेश करने वाले युवाओं की पीढ़ी ने इसे नशेड़ियों और यौन मनोरोगियों का अड्डा बना दिया है। किसी भी कला-क्षेत्र की तरह सिनेमा की दुनिया भी कभी नशे से मुक्त नहीं रही थी, मगर यह नशा पहले शराब तक सीमित था।
एल.एस.डी, हशीश, कोकीन, हेरोइन जैसे ड्रग्स का फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश शायद पिछली सदी के आठवें दशक में हुआ, मगर तब यह मुट्ठी भर लोगों तक सीमित था। पिछले दस-बीस सालों में उभरने वाले कलाकारों में ज्यादातर ने ड्रग्स को अपनी जीवन-शैली में शामिल कर लिया। उनके आसपास ड्रग की बिक्री और वितरण करने वालों की भीड़ लगने लगी। पुलिस की नाक के नीचे बड़ी - बड़ी रेव पार्टियां आयोजित होती हैं।
धीरे-धीरे फिल्मों में नए आनेवाले युवाओं के मन में यह बात गहरे बिठा दी गई कि नशे और यौन अराजकता वाली इन पार्टियों में शामिल हुए बगैर वे इंडस्ट्री के बड़े लोगों का ध्यान आकृष्ट नहीं कर पाएंगे और उनका कैरियर भी परवान नहीं चढ़ेगा। यह भी कि ड्रग लेने से चेहरे पर कांति, व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और अभिनय में गहराई आती है। नतीज़ा वही हुआ जो आज सुशांत और रिया के मामले में धीरे-धीरे हमारे सामने आ रहा है।
एन.सी.बी ने अभी तक ड्रग के धंधे और इस्तेमाल में लगे जिन लोगों को पकड़ा है, वे इस क्षेत्र की छोटी मछलियां हैं। नशे के बड़े सौदागरों और उपभोक्ताओं पर हाथ डाले बगैर बॉलीवुड के हालात नहीं बदलेंगे। अपने प्रिय सितारों की देखादेखी देश के आम युवाओं में भी ड्रग का क्रेज बढ़ेगा। हम तो कामना ही कर सकते हैं कि बॉलीवुड का और हमारे समाज का भी यह नशीला गटर जल्दी से जल्दी साफ़ हो।

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