ये बालियां किसान के पसीने की उपज हैं, 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत क़र्ज़ में दबे हुए हैं?


सौमित्र रॉय 

मोदी सरकार ने औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक में हड़ताल पर जाने के मजदूरों के अधिकारों पर अत्यधिक बंदिश लगाने का प्रावधान किया गया है।

नियुक्ति एवं छंटनी संबंधी नियम लागू करने के लिए न्यूनतम मजदूरों की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर दिया गया है। यानी सरकार से बिना पूछे रखने और निकालने का अधिकार। 

74 फीसदी से अधिक औद्योगिक श्रमिक और 70 फीसदी औद्योगिक प्रतिष्ठान ‘हायर एंड फायर’ व्यवस्था में ढकेल दिए गए हैं। 

अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों के लिए कार्यस्थल के नजदीक श्रमिकों के लिए अस्थायी आवास मुहैया कराने के पहले के प्रावधान को हटा दिया गया है। मोदी ने मज़दूरों के लिए आवास सुविधा की बात की थी। 

किसी हादसे में श्रमिक की शारीरिक क्षति की भरपाई और मालिक पर लगाए जुर्माने का आधा हिस्सा श्रमिक को मिलेगा। इसकी नियम-शर्तें क्या होंगी, ये नियम बनने पर पता चलेगा। लेकिन एक घायल मजदूर के लिए यह आसान नहीं होगा। 

संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिकों को पेंशन योजना का लाभ मिलेगा। लेकिन जब रोजगार की ही गारंटी नहीं होगी तो ये सब बातें बेमानी हैं। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के नए डेटा को एक बार फिर देखना चाहिए, जिसके मुताबिक साल 2019 में 42,480 किसानों और दैनिक मजदूरों ने आत्महत्या की है। मजूदरों की आत्महत्याएं आठ फीसदी बढ़ी हैं।

भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत क़र्ज़ में दबे हुए हैं। वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी। 

भारत में वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी। भारत में किसान परिवार में औसत सदस्य सख्या 4.9 है, यानी प्रति सदस्य आय 61 रुपये प्रतिदिन है। 

देश में किसानों की सबसे कम मासिक आय मध्यप्रदेश (7,919 रुपये), बिहार (7,175 रुपये), आंध्र प्रदेश (6,920 रुपये), झारखंड (6,991 रुपये), ओडिशा (7,731 रुपये), त्रिपुरा (7,592 रुपये), उत्तर प्रदेश (6,668 रुपये) और पश्चिम बंगाल (7,756 रुपये) है। 

किसानों की आय में उत्तरप्रदेश और पंजाब के बीच साढ़े तीन गुना का अंतर है। मोदी सरकार 2022 तक इस फ़ासले को खत्म करने की बात कर रही है और वह भी खेती को कंपनियों के हवाले कर। 

2012-13 की एनएसएसओ रिपोर्ट को पढ़ें तो शर्मसार हो जाएंगे। 

भारत में किसान परिवार की औसत मासिक आय 6,426 रुपये थी। इसमें से 48 प्रतिशत यानी 3,081 रुपये की आय फसल से हासिल होती थी। 

वर्ष 2016-17 में (नाबार्ड रिपोर्ट) यह आय घट कर 35 प्रतिशत पर आ गई। 

2019 में किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी, जिसमें से केवल 3,140 रुपये (35 प्रतिशत) की आय खेती से हुई यानी 5 साल में केवल 59 रुपये की वृद्धि हुई है। 

बीते पांच सालों में किसानों की कुल मासिक आय में हुई वृद्धि में सबसे बड़ा हिस्सा मजदूरी से होने वाली आय का रहा है, जो पांच सालों में 2,071 रुपये (32 प्रतिशत) से बढ़कर 3,025 रुपये (34 प्रतिशत) हो गई। 

गांव का एक किसान मजदूर भी है। किसान को मज़दूर से अलग नहीं कर सकते।  

भारत सरकार के कृषि लागत और मूल्य आयोग ने अपनी विभिन्न रिपोर्टों में किसान की आय दोगुनी करने के लिए 8 बातें कही थीं। 

आठवीं बात किसानों को खेती से निकालकर गैर-कृषि काम यानी मज़दूरी में लगाने की थी। 

मोदी सरकार को आयोग की आखिरी सिफारिश ही पसंद आई। दरअसल देश भोजन की खेती को खत्म कर, बेरोजगारी की खेती करने जा रहा है। 

बढ़ती नफ़रत, सड़कों पर उतर चुकी हिंसा, असुरक्षा और गैर-बराबरी के बीच इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान गया ही नहीं कि भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत किसान कर्ज में दबे हुए हैं। 

देश में एक किसान के पास औसतन 1.1 हेक्टेयर जमीन हैं, जिसमें से 60 प्रतिशत सिंचित नहीं होती है। ऐसे में हर कर्जदार किसान पर 1.046 लाख रुपये का कर्ज है। 

केवल 26 प्रतिशत किसान के पास किसी भी तरह का बीमा है। केवल 5 प्रतिशत किसानों के पास स्वास्थ्य बीमा है। 66.8 प्रतिशत किसानों के पास इतना पैसा भी नहीं बचता है कि वे बीमा करवा सकें। 

भारत में केवल 5.2 प्रतिशत किसानों के पास ट्रैक्टर हैं, 1.8 प्रतिशत के पास पावर टिलर, 0.8 प्रतिशत के पास स्प्रिंकलर, 1.6 प्रतिशत के पास ड्रिप सिंचाई व्यवस्था और 0.2 प्रतिशत के पास हार्वेस्टर हैं। 

भारत में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है, जो बताए कि बीते दो दशकों में सवा तीन लाख किसानों ने कर्जा लेकर आत्महत्या क्यों की? खेती छोड़ने के बाद किसान का क्या होता है? उसकी जिंदगी कैसे बदलती है? परिवार का क्या होता है? 

आज किसानों-मज़दूरों के भारत बंद के आह्वान पर संवेदनशीलता के साथ इन प्रश्नों पर विचार करें। जुमलों, फ़र्ज़ी पोस्टरों, हवा-हवाई बातों/आरोपों से कुछ नहीं होगा। 

ठोस तथ्य हों तो ही कमेंट करें। वरना, मैं मान लूंगा कि आप भी रोटी का टुकड़ा मुंह में डालने से पहले गेहूं की बालियों को याद नहीं करते। ये बालियां एक किसान के पसीने की उपज है।


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