हमें हमारा मीडिया शर्म की बातों पर भी गर्व करना सीखा रहा है ताकि हम अपने हक की बात सरकार से न कर पायें


गिरीश मालवीय 
शर्म की बात पर गर्व करना: झारखंड के रहने वाले युवक ने अपनी गर्भवती पत्नी को स्कूटर पर बिठाकर ग्वालियर तक 1,200 किलोमीटर का सफर तय किया ताकि उसकी पत्नी डी एड की परीक्षा दे सके......
अब इस दंपती को नायकों की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है
कुछ महीने पहले लॉक डाउन में बिहार की लड़की द्वारा अपने पिता को घर ले जाने 1200 किलोमीटर साइकिल का सफर को मीडिया हाइलाइट कर रहा था, बाद में इस खबर का भी पोलिटिकल माइलेज लेने की कोशिश की गयी
सोनू सूद द्वारा प्रवासी मजदूरों की मदद को मीडिया ने इतना माइलेज दिया कि लोगो को सोनू सूद विष्णु का अवतार नजर आने लगे लोग उनसे अब ट्वीटर पर अपनी विश पूरी करने की डिमांड करते हैं
एक बात बताइये !......इन तीनो घटनाओ में किसकी गलती है क्या सरकार का यह कर्तव्य नही है कि वह अपने नागरिकों को आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराए?.... क्या यह सरकार का कर्तव्य नही है कि वह अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उनके अपने शहर में गाँव मे उपलब्ध करवाए?
यहाँ हो यह रहा है कि हमारा मीडिया हमारे दिमाग को डायवर्ट कर रहा है ताकि हम सरकार से कोई सवाल न करे उन पर उँगली न उठाए बल्कि उल्टा इन बनावटी नायकों की प्रशंसा करे.....इन्हें अपना आइडियल माने
हरिशंकर परसाई ने कही लिखा है कि 'जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसें और ताली पीटें, उसमें क्या कभी कोई क्रांतिकारी हो सकता है? .....
हमें हमारा मीडिया शर्म की बातों पर भी गर्व करना सीखा रहा है ताकि हम अपने हक की बात सरकार से न कर पाए यह खेल समझना और समझाना बहुत जरूरी है

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