मुसलमानों का कोई भी पंथ सिनेमा को जायज़ करार नहीं देता है क्योंकि...


शादाब सलीम
कंगना रनौत ने अपने एक ट्वीट में कहा था कि वह इस्लाम डोमिनेट इंडस्ट्री में संघर्ष कर रही है। इस ट्वीट की समीक्षा का मन हुआ है। हम मूर्खता के किस कालखंड में जी रहे है इसकी सीमाओं पर आश्चर्य हो चलता है।
जब शिव सेना के लोग लपक गए तो फिर बीच में मुसलमानों को उठा लाए। बाबर को इतिहास से खोजकर फिर ज़िंदा किया। असल में शिवसेना के उदंड लोगों से निपटते नहीं बना तो मुसलमानों की ढाल बना ली। शिवसैनिक सदा से ऐसे ही है उन्होंने दफ्तर क्या तोड़ा उन्होंने तो उत्तर भारतीय और तमिल के लोगों की हड्डियां तोड़ी है, हिंदी प्रदेशों को वह गोबरपट्टी कहते है, उनका अनुमान है महाराष्ट्र ही सारे भारत को चला रहा है, उन्हें महाराष्ट्र के शहरों पर अभिमान है क्योंकि महाराष्ट्र ही वह प्रदेश है जहां सबसे अधिक शहर है। मैं हमेशा कहता हूं- मुसलमान इस देश के खुदा मालूम कितने नाकारा लोगों की दुकानें चलवा रहे है।
बहरहाल दिलीप कुमार जब सिनेमा में काम करने आए तो उनके परिवार ने विरोध किया। परिवारजनों का कहना था पठान क्या नाचने गाने का काम करेगा यह तो मिरासियो के काम है।
उनके रिश्तेदार एक अरसे तक इस बात का कड़ा विरोध करते रहे कि तुम मिरासियो का काम कर रहे हो। दिलीप कुमार दूरदर्शी थे वह जानते थे यही मिरासियो के काम से सल्तनत खड़ी की जा सकती है और यही हुआ भी, सामाजिक मापदंड बदल गए क्योंकि समाज तो बदलता ही है, दिलीप कुमार ने अकूत धन कमाया और भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश यहां तक अरब के देशों में भी लोगों के दिलों पर एक ज़माने तक हुकूमत की। इस्लाम आधारित देश पाकिस्तान ने उन्हें अपने देश का सर्वोच्च सम्मान निशान ए इम्तियाज देने के लिए आमंत्रित किया।
दिलीप कुमार से बायर चली और दिल्ली के पठान जाति के शाहरूख भी सिनेमा में आए। इंदौर के मशहूर मराठा सेना के लड़ाके सलीम खान का परिवार भी सिनेमा में आया।
असल में इस्लाम सिनेमा का भरपूर विरोध करता है। हमारे घरों में हमारी नानी दादी टीवी को शैतान का खिलौना कहती थी और सिनेमा उनके लिए सख़्त कबीरा गुनाह था ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं है। हमारे पुरखों को सिनेमा में काम करने वाले मुसलमानों से सख़्त नफ़रत थी क्योंकि यह लोग इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ गए। मुसलमानों का कोई भी पंथ सिनेमा को जायज़ करार नहीं देता है।
महान रजनीश कहते है कि जहां प्रतिबंध होंगे वहां वही चीज़ अधिक होगी। एक बच्चें को कहा जाए पानी के पास मत जाना तो बच्चे में पानी को ढूंढने की जिज्ञासा पैदा हो जाएगी, आख़िर ढूंढो तो सही पानी होता कैसा है!
इस्लाम ने सिनेमा को प्रतिबंधित किया और उतने ही निषांत कलाकार मुसलमानों में पैदा हुए। दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, शाहरुख खान और बहुत लंबी फेहरिस्त है।
किसी नामालूम शायर का शेर है-
ज़ाहिद-ए-तंग-नज़र ने मुझे काफ़िर जाना
और काफ़िर ये समझता है मुसलमान हूँ मैं
कुछ ऐसा ही मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी कहा-
ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे
सिनेमा इस देश की धर्मनिरपेक्ष संस्था रही है जहां धर्म नाम का कोई बवाल ही नहीं है। वहां एक ही बंगले के एक ही कमरे में कृष्ण की भी पूजा होती है और नमाज़ भी पढ़ी जाती है, वहां कोई जाती पाती और धर्म के झगड़े नहीं है।

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