मुसलमानों का शिवसेना से छत्तीस का आंकडा था लेकिन अब...

सिद्धार्थ ताबिश
बाल ठाकरे का कहना था कि “मैं इस्लाम को उसके घुटने पर ला कर छोडूंगा”.. यही उनकी  पार्टी लाइन थी और यही इनके चढ़ने का कारण.. यही कट्टर हिंदुत्व का एजेंडा ले कर ये उस दौर में आगे बढे थे जब बॉम्बे में डॉन लोगों का जलवा था, जिनमे से ज़्यादातर मुसलमान थे.. ज़ाहिर बात है कि मुसलमानों का शिवसेना से छत्तीस का आंकडा था.. अपनी सबसे क़रीबी “विचारधारा” वाली पार्टी के साथ शिवसेना ने बरसों गठबंधन किया.. कुछ नहीं पाया.. अब अपनी विचारधारा की घुर विरोधी और एकदम उल्टी पार्टी के साथ जाकर मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया.. अब हालात बदल गए हैं
अब मुसलमान ख़ूब जोर शोर से शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के फैन हो गए हैं.. हर काम की वाह वाही हो रही है.. कह रहे हैं कि “अल्लाह जब चाहे किसी को हिदायत दे दे”.. तो इनके हिसाब से उद्धव को अल्लाह ने हिदायत दे दी है.. और अब वो BMC भेज के कंगना का ऑफिस गिरवा देंगे तो वो सब “अल्लाह का अज़ाब” होगा.. वो बदला ले रहा है उद्धव को हिदायत देकर
उत्तर प्रदेश में जोगी विरोधी लोगों के घर “कुर्क” करवाए तो जोगी जी ज़ुल्म कर रहे हैं.. उन्हें “राजधर्म” नहीं आता है, बाल हठ करते हैं.. जोगी जी हज हाउस बना देते तब माना जाता अल्लाह उन्हें हिदायत दे रहा है.. अभी तो वो “शैतान” के बहकावे में हैं और छप्पन कोसी परिक्रमा पर काम कर रहे हैं.. फिर कोई दूसरा नेता आएगा अगली बार तो वो अल्लाह कि हिदायत के साथ आएगा, फिर वो दीन और ईमान के रास्ते पर काम करेगा जैसा उद्धव कर रहे हैं.. या जोगी जी कांग्रेस में चले जाएँ तो उसे भी “अल्लाह की हिदायत” मान लिया जाएगा और वो “ईमान” वाले हो जायेंगे
आपको लगता है कि कोई विचारधारा की लड़ाई है ये? किसी एक का ज़ुल्म दूसरे का उत्सव होता है और ये कहते हैं कि ये “विचारधारा” पर लड़ते हैं.. रवीश कुमार बस “मंदिर वहीँ बनायेंगे” का बैनर लगा लेते एक दिन अपनी वाल पर.. बस.. सब विचारधारा गयी तेल लेने.. सारा इन्साफ और अद्ल गया भाड़ में.. डॉक्टर कफ़ील जेल से निकलकर दाढ़ी कटवा लेते हैं और कृष्ण का उदाहरण देते हैं “मुहम्मद” के बजाये, तो लाखों करोड़ों के दिल टूट जाते हैं.. कफ़ील अब “शैतान” की गिरफ्त में हैं और जो दुवाएं मांग रहे थे उनके बहार आने की वही “रिवर्स” दुवा मांग रहे हैं अब
ये सब पागलों की जमातें हैं.. इनकी दोस्ती बंदर की दोस्ती होती है.. हर धर्म के धार्मिक ऐसे पागल होते हैं.. इनकी कोई विचारधारा नहीं होती है सिवाए दाढ़ी, टोपी, भगवा और तिलक के.. इसलिए इनकी पसंद और नापसंद के हिसाब से नेताओं को और लोगों को देखना बंद कीजिये
मैं तो इनके गुट से निकल के इतना चैन और सुकून महसूस कर रहा हूँ कि न पूछिए.. आधा बुद्धत्व तो मुझे इन “घिनौने बंधनों” को तोड़कर ही प्राप्त हो गया है.. मन में इतना चैन है अब कि न तो उद्धव बुरे लगते हैं न योगी.. और न मोदी बुरे लगते हैं और न ओवैसी.. अब बस इन लोगों का बुरा काम बुरा लगता है.. क्यूंकि ये लोग अब न तो मेरे धर्म, गुट, गिरोह और सम्प्रदाय के हैं और न ही मुझे अपने आपको इनसे उस तरह से जोड़ के देखना है.. मानसिक सुकून है अब
आप अपनी विचारधारा के विरोध का ढोल पीटिये.. मुझे असलियत पता है.. मैं बैठ के हंसता हूँ अब 🙂

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