एक साल में 42,480 किसानों और दिहाड़ी मज़दूरों ने दे दी जान

सौमित्र रॉय 
यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। एक ज़िन्दगी के ख़त्म होने से कई और जिंदगियां भी मौत के कगार पर पहुंच जाती हैं। साल-दर-साल मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है और हम सिर्फ 6-8% की वृद्धि दर्ज़ कर फ़ाइल बंद कर देते हैं।
जीडीपी 24% गिरी है और सरकार देश के अन्नदाताओं की तरफ उम्मीद से देख रही है और अन्नदाता अपनी ज़मीन और आसमान की ओर। उसे मालूम है कि उसके उपजाए अन्न को खाने के बाद लोग उसे भूल जाएंगे। मरने के लिए छोड़ देंगे।
फिर भी अन्नदाता का दिल बहुत बड़ा है। इतना बड़ा कि आसमां भी रो पड़ता है और ज़मीन सारी ताक़त लगा देती है। आंसू तो हमारे सूख गए हैं। इन्हें बचाकर रखिए।

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