आख़िर इन ड्रग्स की दवा क्या है?


ध्रुव गुप्त 

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा अभी बॉलीवुड में ड्रग माफिया के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बाद ड्रग्स पहली बार आम जनजीवन में इतने बड़े पैमाने पर चर्चा और विमर्श का विषय बना है। जिस एक ड्रग का विभिन्न रूपों में अपने देश और दुनिया में भी सबसे ज्यादा सेवन होता है, वह है गांजा। गांजे के पौधे का वैज्ञानिक नाम कैनेबिस है। इसे मारिजुआना, वीड, स्टफ, पॉट, ग्रास आदि नामों से भी जाना जाता है। 

कैनेबिस के फूलों से गांजा, इसके पौधे के रेज़िन से चरस या हशीश अथवा हैश और इसके और कई हिस्सों से दूसरे कई ड्रग्स तैयार होते हैं। अमेरिका के कुछ राज्यों, कनाडा और उरुग्वे को छोड़ फिलहाल दुनिया के अधिकतर देशों में गांजे पर प्रतिबन्ध है। सिर्फ चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए ही इस प्रतिबंध में छूट दी जाती है। हमारे अपने देश में हज़ारों साल से इसका उपभोग आम रहा है। इस पर कभी कोई रोक-टोक नहीं थी। राजीव गांधी की सरकार द्वारा पहली बार वर्ष1985 में इसे प्रतिबंधित ड्रग्स की सूची में शामिल किया गया। 

गांजे पर प्रतिबन्ध के बावजूद दुनिया के कई हिस्सों में गांजे की खेती होती है। अफगानिस्तान- पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्र इसकी खेती के सबसे बड़े केंद्र हैं जहां से स्मगल होकर यह दुनिया भर में पहुंचता है। इस तस्करी में तालिबान समेत कई आतंकी संगठन शामिल हैं जिनकी आर्थिक संपन्नता का यह प्रमुख ज़रिया है। हमारे देश के भी कई हिस्सों, विशेषकर हिमालय क्षेत्र में चोरी-छिपे इसकी खेती होती है। दुनिया भर में गांजे का अरबों डॉलर का विशाल कारोबार है। 

इसकी व्यापकता को देखते हुए दुनिया के कई देशों में यह मांग उठ रही है कि गांजे के पौधों से बने दूसरे ड्रग्स पर प्रतिबंध रहे लेकिन गांजे को इससे मुक्त किया जाय। गांजे के समर्थन में कई तर्क दिए जाते रहे हैं। मसलन कैंसर की रोकथाम और इलाज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। दमा, पुराने दर्द, ग्लूकोमा जैसी बीमारियों की यह कारगर औषधि है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए शोध के अनुसार गांजे की कैंसर जैसे कुछ रोगों की चिकित्सा में भूमिका तो है, मगर चिकित्सीय देखरेख में ही इसे दिया जा सकता है। फ्रांस के लोग नशे के अलावा आत्मविश्वास बढाने के लिए इस ड्रग का उपयोग करते हैं। 

अफ्रीकी देशों में सेक्स की इच्छा और शक्ति बढ़ाने के लिए गांजे का उपयोग होता रहा है। अब यूरोप में भी सेक्स के लिए गांजे का इस्तेमाल होने लगा है, हालांकि वैज्ञानिक शोध से गांजे और सेक्स के बीच किसी रिश्ते की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है। हमारे अपने बॉलीवुड के लोग मौज-मस्ती के अलावा चेहरे की रौनक और व्यक्तित्व की आभा बढाने के लिए गांजा और उसके अन्य उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत में साधु-सन्यासियों के बीच गांजा हज़ारों साल से सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य नशा है। इसे सदियों से सामाजिक स्वीकृति भी हासिल रही है। अथर्ववेद में गांजे के पौधे की गिनती पांच महानतम पौधों में की गई है। गांजे का प्राचीन नाम ज्ञानदा बताया जाता है जो कालांतर में बिगड़कर गांजा हो गया। साधु-संतों का मानना है कि गांजे की चिलम फूंकने से दुनिया की व्यर्थ की बातों से ध्यान हट जाता है। मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है जिसके कारण ध्यान और समाधि आसानी से लग जाती है। गांजे के पक्ष में अपना मत मजबूत करने के लिए कुछ सन्यासियों ने भगवान शिव तक के हाथों में गांजे की चिलम पकड़ा दी हैं। भगवान शिव की गांजा फूंकती आपत्तिजनक तस्वीरें बाजार में और सोशल मीडिया में भी उपलब्ध हैं जिनका चौतरफ़ा विरोध हो रहा है।

देखा जाय तो कुछ औषधीय उपयोगों के सिवा गांजे के समर्थन में दिए जानेवाले तमाम तर्क अवैज्ञानिक और मनगढ़ंत हैं। सच यह है कि गांजा स्नायुवों को कुछ घंटों के लिए शिथिल भर कर देता है। मष्तिष्क के शिथिल होने से ध्यान या समाधि लगने और इस दुनिया के पार एक दूसरा संसार देख पाने का भ्रम पैदा होता है। यह एक तरह का केमिकल लोचा है जो मतिभ्रम पैदा करता है। लगातार इसका धुआं पीने वाले लोगों में उस काल्पनिक संसार में डूबने की इच्छा तीव्र से तीव्रतर होती चली जाती है। ऐसे लोग अपनी वास्तविक दुनिया के प्रति आकर्षण खोकर धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित और अकेला होते चले जाते हैं। कम उम्र और अपरिपक्व मष्तिष्क वाले किशोरों के दिमाग को गांजा अपाहिज और कुंद भी कर दे सकता है। सांस के रोगियों और गर्भवती महिलाओं पर इसका असर घातक होता है।

साधु-सन्यासियों से चलकर गांजा अब सिनेमा, फैशन और ग्लैमर इंडस्ट्री तक ही नहीं, देश के उच्च शिक्षा संस्थानों और छात्रावासों तक पहुंच चुका है। ग्रामीण क्षेत्र में परंपरागत रूप से इसकाचलन रहा है। अब शहरी युवाओं में इसका आकर्षण और प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ा है। उसके सेवन के तरीके जरुर बदल गए है। लोगों की नज़रों से बचने के लिये गांजे की सूखी पत्तियों को चिलम में सुलगा कर दम मारने की जगह अब सिगरेट के पेपर में लपेटकर कश लिया जाता है। जलाने का साधन न मिलने पर लोग इसे सीधे भी फांक लेते हैं। पिछले कुछ दशकों में गांजे और उससे बने मादक पदार्थों का इस स्तर पर बढ़ते उपयोग को देखते हुए लगता है कि आने वाले वर्षों में देश की युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा ड्रग्स की गिरफ्त में होगा। 

गांजे और उससे जुड़े मादक पदार्थों के देश में प्रसार को देखते हुए यह असंभव लगता है कि एन.सी.बी या पुलिस जैसी एजेंसियां कभी इनपर कारगर नियंत्रण पा सकेंगी। दिखावे के लिए वे इधर-उधर से कुछ लोगों को पकड़ भी लें तो गांजाखोरों की सबसे बड़ी जमात साधु-सन्यासियों पर हाथ डालने की हिम्मत वे कहां से जुटा पाएंगी ?  

इसे रोकने के लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बड़े स्तर पर जन जागरूकता अभियान चलाने के अलावा इसकी जड़ पर ही चोट करने की जरूरत होगी। यह देखना होगा कि प्रतिबंध के बावजूद देश में इस बड़े पैमाने पर गांजा उपजता और आता कहां से है ? अपने देश में गांजे की खेती पर कारगर रोक लगाने के अलावा विदेशों से इसकी तस्करी के सभी रास्ते बंद करने होंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार के पास इस लक्ष्य को हासिल करा सकने वाला सक्षम और ईमानदार तंत्र मौज़ूद है भी ?

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