अब गोदी मीडिया से निपटने का यही एक सॉल्यूशन है?


श्याम मीरा सिंह 
आपकी नौकरी की बात है, आपके पेट की बात है, आपकी EMI नहीं भरी हुईं हैं, आप पर कार लोन है, आपको बाइक खरीदनी है, आपका बॉस हरामी है, आपकी नौकरी जाने वाली है, चाहे जो भी, जैसा भी दबाव हो लेकिन आपको इससे कोई हक नहीं मिल जाता कि लाख मना कर देने पर भी आप चील कव्वों की तरह किसी से चिपट जाएं।
वैसे तो मीडिया में एकदम फकीर कोई नहीं है, अगर आपको अपने पेशे के लोग ही मासूम नजर आते हैं तो बाकी लोगों की मजबूरियां आपने देखी ही नहीं। माइक ठूंस देने वाले लगभग हर रिपोर्टर को 30 से 60-70 हजार के बीच मिलते हैं। सीनियर हो जाने पर ये रकम और भी अधिक होती जाती है। लेकिन मान लेते हैं आपकी नौकरी आपकी मजबूरी भी है। तब भी आपकी मजबूरी किसी की राइट टू प्राइवेसी की धज्जियां उड़ाने का बहाना नहीं बन सकती।
अगर आपको नौकरी की मजबूरी है तो इस का मतलब ये नहीं है कि आप किसी को भी घेरकर उसका जीना मुहाल कर देंगे। हमने इस दौर की "चील पत्रकारिता" देखी है, ये पत्रकारिता नहीं चैनलों की लठैती है, और आप पैसों के लिए उस लठैती में शामिल हो रहे हैं तब आप भी इस जुर्म में बराबर के हिस्सेदार हैं। आपकी मजबूरी आपको सहानुभूति दे सकती है किसी के मुंह में माइक घुसाने का अधिकार नहीं देती।
बाकी गोदी मीडिया के पत्रकारों की कोई मजबूरियां हम खूब जानते हैं। 30-30, 40-40 हजार, 60-60 हजार की सेलरियाँ लेने वाली मजबूरियां खूब समझ आती हैं।
मैं तो कहता हूं अगर दो बार मना कर देने पर भी कोई आपके मुंह में माइक घुसा दे तो तुरंत उस माइक को उसके यथास्थान पर स्थापित कर दें। बाद में अपने इस जुर्म के लिए कोर्ट में जुर्माना भरते हुए जमानत लेकर कानून और संविधान का पालन करें, इससे देश के रेवेन्यू में भी वृद्धि होगी, राष्ट्रीय राजकोष का पैसा राष्ट्रहित में कहीं काम आएगा। इससे गोदी मीडिया को भी सबक मिलेगा। यही एक सॉल्यूशन है इस "चील मीडिया" से निपटने का।

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