उत्तर प्रदेश में 5414 किसानों ने आत्महत्या की, कहीं भी कोई चर्चा नहीं?


वसीम अकरम त्यागी 
एनसीआरबी के मुताबिक़ साल 2019 में अकेले उत्तर प्रदेश में 5414 किसानों ने आत्महत्या की हैं। यह आंकड़ा बहुत बड़ा है। भारत के इस अन्नदाता की मौत का ज़िम्मेदार पाकिस्तान नहीं है, चीन नहीं है, आतंकवाद नहीं है। बल्कि भारत की सरकारों की किसान विरोधी नीति हैं।
सोचिए पुलवामा में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की संख्या सिर्फ 44 थी, लेकिन टीवी चैनल्स और मौजूदा सत्ताधारियों ने उसे किस तरह प्रचारित किया था, किस तरह पुलवामा के नाम पर वोट मांगा गया। टीवी चैनल्स ने हफ्तों तक शहीदों के शवों को दिखाया, लोगों के गुस्से को उबाला गया, गली गली में दुश्मन देश के खिलाफ जुलूस निकाले गए।
लेकिन उसी देश में महज़ एक साल में पांच हज़ार से ज्यादा किसान आत्महत्या करके मर गए लेकिन कहीं उनका ज़िक्र नहीं, किसी आयोग का गठन नहीं, कोई एसआईटी नहीं बैठाई गई। मीडिया में चर्चा तक नहीं हुई, डिबेट तो क्या होतीं।
अब हरियाणा में किसानों पर लाठियां बरसीं हैं, कईयों के सर फूटे हैं, कुछ की हड्डियां टूटी हैं, जो सही सलामत बचे हैं उनकी कमर को मुक़दमा लादकर तोड़ा जाएगा। लेकिन ये सब ख़बरे नहीं है, मुद्दे नहीं हैं। मुद्दा तो एक बदज़ुबान अभिनेत्री का स्यापा है। उसका मंदिर में दर्शन करने जाना ख़बर है, राज्यपाल से मिलने जाना ख़बर है।
लेकिन पुलिस की लाठी से दर्द से कराह रहे किसान ख़बर नहीं हैं। कर्ज में डूबकर मौत को गले लगाते किसान ख़बर नहीं हैं। यूरिया के लिये जूझ रहे किसान ख़बर नहीं हैं। इस देश की आर्थिक, समाजिक तबाही का जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें यह भी लिखा जाएगा कि ख़बरनवीस सत्ता की मदद करके देश के आमजन एंव अपने पेशे से गद्दारी कर रहे थे।

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