ताश के महल का एक भी पत्ता गिरता है तो सब-कुछ बिखर जाता है?



सौमित्र रॉय 

सुदर्शन टीवी के यूपीएससी जेहाद के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आज सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने जो कहा, उससे कहीं न कहीं बेंच और ‘सत्ता’ (यहां संदर्भ भिन्न है) के बीच टकराव के रूप में देखा जा रहा है।

इस पर अभी टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा। आने वाले दिनों में इसकी परतें खुलेंगी। जिन तीन जजों की बेंच के सामने यह मामला है उसमें जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ शामिल हैं।

जस्टिस जोसेफ ने एक गंभीर बात यह कही कि हमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिकाना हक को देखना होगा। कंपनी की शेयरहोल्डिंग को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। कंपनी का रेवेन्यू मॉडल भी चेक करना होगा, ताकि यह देखा जा सके कि कहीं सरकार विज्ञापन बांटने में पक्षपात तो नहीं कर रही है ?

दूसरी अहम बात जस्टिस चंद्रचूड़ ने कही। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि हम सोशल मीडिया में नहीं हैं। हम यह चुनाव नहीं कर सकते कि एक चीज को नियंत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम सभी को नियंत्रित नहीं कर सकते।

आज अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है। इस मौके पर दोनों ही टिप्पणियों से यह साफ है कि मीडिया पर नियंत्रण न करने के बार-बार आग्रह (या दबाव- कुछ भी कह सकते हैं) के बावजूद अगर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाथ डाला है तो निशाना स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र के कथित चौथे पहिए को संचालित करने वाली ताकतें हैं।

इन ताकतों में सरकार भी है। जाहिर तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सरकार की भी नींद उड़ा दी है, क्योंकि अगर चैनलों पर लगाम कसी गई तो सरकार से सवाल पूछना शुरू हो जाएगा और तब हवाई किले एक-एक कर ढहना शुरू हो जाएंगे।

यहां तक कि अर्नब के मामले में भी यह बात नहीं कही गई थी, जो जस्टिस जोसेफ ने आज कही। उन्होंने कहा कि पत्रकार की आजादी असीमित नहीं है। यह आम नागरिकों के ही समान है। अमेरिका में भी पत्रकारों को अलग से कोई आजादी नहीं है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यहां तक कहा कि लेखक और वकील गौतम भाटिया के ब्लॉग में दी जाने वाली वैधानिक चेतावनियों की मुनाफा कमाने वाली कंपनियों से तुलना नहीं की जा सकती। एक अकादमिक ब्लॉग ऐसे संस्थानों से बहुत अलग है।

यानी वैधानिक चेतावनियों के बावजूद चैनलों की बातें तथ्यपूर्ण और अकादमिक विद्वता से परे है। काफी दिनों के बाद एक नई बयार को महसूस कर पा रहा हूं। शुरुआत कहीं से भी हो, पर होनी चाहिए। ताश के महल का एक भी पत्ता गिरा तो सब-कुछ बिखर जाता है।


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