धीरे धीरे सब आतंकी ठहराए जाएंगे, सिर्फ वही लोग ‘देशभक्त’ माने जाएंगे जो उनकी हर अच्छाई बुराई को बिना सवाल किये स्वीकार करेंगे



वसीम अकरम त्यागी 

सबसे पहले उन्होंने मुझे आतंकवादी कहा. मैं कौन हूं? मैं उस समाज से हूं जिसे आतंकवाद ने सबसे ज्यादा निवाला बनाया. जब मुझे आतंकवादी कहा गया तब लेखक, बुद्धिजीवी कुछ नहीं बोले, या बोले भी तो उतना नहीं बोले जितना उन्हें बोलना चाहिए थे। 

फिर उन्होंने अपनी ज़मीन और जंगल की लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों को नक्सली (आतंकवादी) कहा इसके ख़िलाफ बोलने वाली आवाज़ों में कुछ इज़ाफा हुआ। फिर उन्होंने सस्ती शिक्षा मांगते छात्रों को आतंकवादी कहा, इस पर समाज दो वर्गों में बंट गया एक वर्ग वह था जो टीवी न्यूज़ पर भरौसा करता है और दूसरा वह जो न्यूज़ चैनल का ऐजेंडा पहचान चुका है। 

फिर उन्होंने देश में बढ़ती असहिष्णुता के ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाले लेखकों को आतंकवादी कहा, लेकिन समाज चुप रहा, दो दड़ों में बंटा रहा। इसी बीच कोरोना जैसी महामारी ने देश में दस्तक दी, तो उन्होंने फिर से मुझे याद किया और कोरोना के बहाने मुझे आतंकी से भी आगे बढ़कर कोरोना बम कहा गया। 

अब वे अपना अधिकार मांगते किसानों को आतंकवादी कह रहे हैं। कल वे बेरोजगारों को आतंकी कहेंगे, फिर वे हर उस शख्स को आतंकी कहेंगे जो अपने अधिकारों की मांग करेगा। धीरे धीरे सब आतंकी ठहराए जाएंगे, सिर्फ वही लोग ‘देशभक्त’ माने जाएंगे जो उनकी हर अच्छाई बुराई को बिना सवाल किये स्वीकार करेंगे।


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