तो फिर देश की जनता को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि मौजूदा सत्ताधारी हों या विपक्ष सब छल कर रहे हैं?


वसीम अकरम त्यागी 

विपक्ष के हंगामे के बावजूद कृषि सुधार बिल राज्यसभा में पारित हो गया। हालांकि इस दौरान राज्यसभा में काफी हंगामा हुआ सभापति का माइक तोड़ा गया, रूल बुक फाड़ी गयी, सेक्रेटरी जनरल का माइक, टेबल तहस-नहस हुआ। सदन के भीतर अंदर सांसदों के साथ, मार्शल्स की धक्कामुक्की भी हुई। लेकिन इसके बावजूद बिल पास हो गया। 

भारतीय लोकतंत्र का विपक्ष संसद में पूरी तरह विफल हो चुका है। मौजूदा सरकार ने विपक्ष के तमाम के हंगामे के बीच वे तमाम बिल पारित कर दिये जिन्हें पारित करा पाना बहुत मुश्किल था। विपक्ष संसद में नाकाम है, अब उसे सड़क पर अपनी ताक़त दिखानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा कौन कर पाएगा? 

जब वातानुकूलित कमरे में बैठने की लत लग जाए तब किसान, मजदूर, ग़रीब, बेरोजगारी के मुद्दों को लेकर सड़क पर कौन उतरेगा? कौन आंदोलन खड़ा करेगा? कौन भारत बंद का आह्वान करेगा? बिना नेता के जनता अगर सड़क पर उतरी तो सत्ता के अहंकार में चूर सरकार उसका दमन करेगी. 

इसलिये अगर विपक्ष वास्तव में किसानों के साथ है तो वह सड़क पर उतरे, और यदि विरोध सिर्फ ‘दिखावा’ एंव किसी ‘सैटिंग’ के तहत था तो फिर इस देश की जनता को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि मौजूदा सत्ताधारी हों या विपक्ष सब उसके साथ छल कर रहे हैं।


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