क्या गुलामों को फिर गुलाम बनाया जाएगा?


अमन पठान
राजा महाराजा, जमीदारों की गुलामी करने के बाद अंग्रेजों की गुलामी करने वाले पूर्वजों के वंशज आज नेताओं के मानसिक रूप से गुलाम हैं। अगर मेरी बात पर विश्वास न हो तो आप किसी नेता को अपशब्द बोलकर देख लीजिए, उस नेता से पहले उसके गुलामों के तन बदन में आग लग जायेगी और गुलामों की फौज की एक टुकड़ी आपके खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने थाने पहुंच जाएगी।
कृषि अध्यादेश को लेकर जहां एक ओर गुलाम पत्रकार कृषि अध्यादेश के फायदे गिना रहे हैं तो वहीं जिंदादिल पत्रकार कृषि अध्यादेश को गुलामी का प्रतीत साबित करने पर तुले हुए हैं। कृषि अध्यादेश की असलियत क्या है यह समझदारों को बताने की जरूरत नहीं है लेकिन मानसिक रूप से नेताओं के गुलामों को यह बताने की आवश्यकता है कि गुलामों को गुलाम बना भी दिया गया तो उन्हें कोई फर्क नही पड़ेगा क्योंकि गुलामी का खून तो उनकी रगों में दौड़ ही रहा है।
क्रांतिकारी कल भी थे और आज भी हैं। अगर गुलामों ने इतिहास में क्रांतिकारियों की गाथाएं न पढ़ी हों तो वह दुबारा क्रांतिकारियों का इतिहास पढ़ें क्योंकि क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की ईंट से ईंट बजा दी थी। जो सरकार आम जनता से ज्यादा पूंजीपतियों के लिए फिक्रमंद हो वो ऐसे ही फैसले करेगी जिससे पूंजीपतियों को लाभ हो। भारत की जनता हर हाल में खुश रहना जानती है, अगर यकीन न हो तो वक़्त के पन्ने पलटकर देखिए 2016 में नोटबंदी के दौरान देश की जनता ने क्या परेशानी नही झेली उसके बाबजूद जनता ने फिर उसी सरकार को चुना जिसने तकलीफ दी थी।
कृषि अध्यादेश लाकर सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है जो काम सरकार करती आ रही थी अब वही काम निजी कंपनियां करेंगी। बस फर्क इतना होगा कि खरीद फरोख्त कंपनियों की मनमर्जी से होगी। कृषि अध्यादेश लागू होने के बाद ज्यादा से ज्यादा क्या होगा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले गरीबों को सरकारी राशन की दुकान से सस्ता राशन मिलना बंद हो जाएगा। गरीब भूख से मर जायेंगे तो देश से गरीबी खत्म हो जाएगी। जिन्हें जिंदा रहना होगा वो सरकार की गुलामी का झंडा उठाएंगे। रही बात किसानों को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की तो साहिबे मसनद की ये ख्वाहिश कभी पूरी नही होगी क्योंकि जो किसान धरती का सीना चीरकर अनाज उगा सकता है वो क्रांति की नई इबारत भी लिख सकता है? बस सरकार से एक सवाल है कि कृषि अध्यादेश लाने की आखिर क्या जरूरत थी?
रही बात गुलामों को गुलाम बनाने की तो गुलामों के वंशज तो पहले से ही गुलाम हैं जिन्हें हम भक्त और चमचों के नाम से भलीभांति जानते पहचानते हैं। जिनकी रगों में क्रांतिकारियों का खून दौड़ रहा है वो अपने क्रांतिकारी होने का परिचय दे रहे हैं। जिनके पूर्वजों को ब्रिटिश सरकार का खौफ नही था उनके वंशज मोदी सरकार से कैसे खौफजदा हो सकते हैं। जिनके पूर्वजों ने अंग्रेजों की मुखबिरी की थी उनके वंशज आजकल मोदी सरकार के सामने नतमस्तक हैं। पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का काम होता है सरकार से सवाल करना, अगर सरकार से सवाल करना गुनाह है तो हां मैं गुनाहगार हूं।

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