ईश्वर अगर सच है तो उसकी बनाई सृष्टि मिथ्या कैसे हो सकती है ?



ध्रुव गुप्त 

ईश्वर अगर सच है तो उसकी बनाई सृष्टि मिथ्या कैसे हो सकती है ? हम जिस काल्पनिक स्वर्ग, हूरों और विलासिता की तलाश में अपनी दुनिया को नर्क बनाए बैठे हैं, क्या उनका कहीं कोई अस्तित्व भी है ? 

सब कही-सुनी बातें हैं। ले-देकर हमारे पास यही एक दुनिया है जिसे हम स्वर्ग बना लें या नर्क। अगर कोई ईश्वर है तो वह अपने विराट ब्रह्मांड को छोड़ हमारे बनाए मंदिर-मस्ज़िद के बंद तहखानों में तो नहीं ही रहता होगा। वह इस विशाल सृष्टि को नियंत्रित करने वाली सत्ता या कॉस्मिक ऊर्जा है। 

हम उसके अंश। उसका कोई रूप नहीं जैसे ऊर्जा का कोई रूप नहीं होता। उसे पाना है तो उसकी सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य ही एकमात्र उपाय है। हमारी प्रकृति उस ईश्वर की प्रतिच्छवि है। हवाओं में उसका स्पर्श है। सूरज में उसकी आग। चांद-तारों में उसका नूर। वृक्षों में उसकी करुणा। फूलों में उसकी मुस्कान। 

बच्चों में उसकी मासूमियत। स्त्रियों में उसका ममत्व। नदी, समुद्र, झरनों की गर्जना और पक्षियों के संगीत में उसके स्वर। बादलों में उसका वात्सल्य। अपनी संतानों के परस्पर प्रेम में उसका ह्रदय धड़कता है। सबके प्रति संवेदना, प्रेम और करुणा में ही ईश्वरत्व की उपलब्धि है। यही स्वर्ग है, यही मोक्ष और यही निर्वाण। 

एक शफ्फाफ़ सा दिल, एक ज़रा भोली आंखें

ये अगर है तो बता किस जगह नहीं है ख़ुदा !

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