जितिया व्रत के मायने !


ध्रुव गुप्त 
अपनी संतानों की लंबी आयु के लिए स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत पूर्वी भारत का एक बहुत लोकप्रिय और कठिन व्रत है जिसमें बिना अन्न-जल के एक पूरे दिन-रात का उपवास रखा जाता है।
इस व्रत के संबंध में कई पौराणिक कथाएं हैं, लेकिन लोक में जो किस्सा सबसे प्रचलित है, उससे पशु-पक्षियों के प्रति हमारी सांस्कृतिक दृष्टि का पता चलता है। लोककथा के मुताबिक एक मादा चील और एक मादा लोमड़ी जंगल में बरगद के पेड़ के नीचे रहते थे।
बरगद के पास महिलाओं को पूजा और उपवास करते देख दोनों ने खुद भी ऐसा करने का फैसला किया। उस उपवास के दौरान लोमड़ी भूख सहन नहीं कर सकी और चुपके से भोजन कर लिया। चील ने निष्ठा के साथ व्रत का पालन किया। नतीजतन लोमड़ी से पैदा हुए बच्चे असमय काल-कवलित हो गए, लेकिन चील की संतानों को लंबी आयु मिली।
स्त्रियां जितिया पर्व के दौरान मिट्टी और गाय के गोबर से बनी सियारिन और चील की प्रतिमाओं पर सिंदूर का टीका लगाती है। रात में घर के बाहर पूर्वजों को याद कर चील, सियार, कौवों, कुत्तों, गायों के लिए भोजन बनाकर रखती हैं। सुबह यदि भोजन समाप्त मिला तो माना जाता है कि पशु-पक्षियों सहित घर के पूर्वज भी तृप्त हुए।
अब यह तो भोली आस्था भर है कि उपवास करने से संतानों की आयु बढ़ती है या जानवरों के भोजन ग्रहण कर लेने से पुरखों को तृप्ति मिलती है, लेकिन इस व्रत के पीछे छुपी अपने पुरखों के सम्मान और पशु-पक्षियों की चिंता की जो उदात्त मानवीय भावनाएं हैं, वे सहेज कर रखने लायक जरूर हैं।

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