देश के ज्यादातर किसान जिस चीज़ के हक़दार थे, वह उन्हें मिला है?


नदीम एस. अख्तर 

देश के ज्यादातर किसान जिस चीज़ के हक़दार थे, वह उन्हें मिला है। वर्ष 2019 के आम चुनाव से पहले भी दिल्ली घुसने के क्रम में जवानों ने किसानों पे लाठियां बरसाईं थीं। सो किसानों के प्रति सहानुभूति जताना और नए नियम-कानून को किसान विरोधी बताना, किसानों की अक्लमंदी का अपमान है। लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है और सरकार अपने विवेक से नए-पुराने क़ानून बनाती-शनाती रहती है। 

विपक्ष का काम है हर बात में हल्ला करना और सत्ताधारी पार्टी का काम है अपना काम आगे बढ़ाते जाना। देश हित में। लोकतंत्र में मेरी पूर्ण आस्था है, सो एक बार सरकार चुने जाने के बाद अगले पांच साल के लिए मैं आंख बंद करके सो जाता हूँ। इस विश्वास के साथ कि जनता की चुनी अपनी सरकार लोकहित में ही फैसले लेगी। और मैं सही हूँ। अगर नहीं, तो क्या हमारे देश के विवेकशील संविधान निर्माता संविधान में ये प्रावधान नहीं करते कि अगर जनता को अपनी चुनी सरकार से पांच साल में जब कभी शिकायत हो तो वह Right to Recall यानी सांसदों-विधायकों को वापिस बुलाने का आह्वान कर सकती है।   

चेक-बैलेंस लगाया तो था ना उन्होंने विधायिका और न्यायपालिका में भी। क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राज्य सभा पहुंच गए। और इसमें संविधान में लिखी एक भी बात का उल्लंघन नहीं हुआ है। सो किसानों से ज्यादा सहानुभूति मत दिखाइए। इस दुनिया में हर इंसान अपना भला-बुरा बखूबी जानता है और उसी के मुताबिक फैसले लेता है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, वह जनता के हित में ही फैसले लेती है क्योंकि जनता ही उसे चुनकर सत्ता की कुर्सी तक भेजती है। 

राजनीतिक पार्टियों को दुबारा वोट मांगने इसी जनता के पास जाना होता है, तो क्या मजाल कि वह जनता के कल्याण के खिलाफ चली भी जाए! क़ानून बनाना तो बहुत दूर की बात है। लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों को जब इस बात का इत्मीनान होता है कि उसके कामों से खुश होकर जनता दुबारा उन्हें चुनेगी, तभी वह किसी विषय पर क़ानून बनाने या अध्यादेश लाने का फैसला लेती है। अब सरकार की मुखालफत तो लोकतंत्र में हर जगह होती है। अपना देश भी कोई अपवाद नहीं। इसका मतलब ये नहीं कि सरकार गलत ही कर रही है। वह गलत करने की नहीं सोच सकती क्योंकि उसे बार-बार जनता से वोट मांगना होता है। 

अभी बिहार में चुनाव हैं, बंगाल में भी होंगे, ऐसे में कौन राजनीतिक पार्टी या सरकार किसानों की नाराजगी मोल लेकर उनके वोट से हाथ धो लेना चाहेगी? सो किसानों से सहानुभूति का खेल मेरे गले नहीं उतरता। वे धरती पुत्र हैं। भारत कृषि प्रधान देश है सो किसान चाहें तो मजबूत से मजबूत सरकार को हिला सकते हैं। किसानों से पंगा इस देश में कोई सरकार नहीं लेना चाहती और ना लेगी। किसान अपनी विकास यात्रा के स्वयं जिम्मेदार हैं। वे जो डिज़र्व करते हैं, वही उन्हें मिलेगा। 

आप खाली-पीली टेंशन ना लें। ये देखें कि सुशांत राजपूत को इंसाफ मिला या नहीं और रिया अभी कितने साल जेल में सड़ेगी? फिर अरबपति कंगना का टूटा बंगला कौन बनाएगा? इसके लिए कोई ऑनलाइन चंदा अभियान भी चलाया जाना चाहिए। बाकी नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वीडियो पे अगर सब देख डाला है तो आजकल tiktok के टक्कर का कोई नया app आ गया है। देश का युवा वीडियो बनाकर हीरो बनने में फिर मस्त है। और क्या चाहिए? सुना है राहुल गांधी के विदेश में होने पे भाई लोग उनको गरिया रहे हैं? 

क्यों भाई? आपको अभी नेपाल का टिकट मिल जाए तो घूमने निकल लोगे, राहुल गांधी क्यों ना घूमें? पूरे देश का ठेका अकेले उसी ने ले रखा है क्या? आपके पेट में क्यों दर्द हो रहा है? आप भी जाओ। घूमो-फ़िरो। दिल्ली में रेस्तरां खुल गए हैं। थोड़ी बैठकी करो और IPL पे चर्चा। किसानों में क्या रक्खा है? मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, कित्ता अच्छा गाना है। और वो प्राण साब का गाया गाना भी- कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, वादे हैं वादों का क्या!!! Cheers!!! चिल्ल मारो।


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