जिन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए अफ़सोस वह मुद्दे मीडिया की प्राथमिकता नहीं हैं?


श्याम मीरा सिंह 

आदमी और नदियों का सम्बंध जीवन-मृत्यु का सम्बंध है। ये एक चक्र है, आदमी नदियों के किनारे जन्म लेता है, नदियों के किनारे शहर बनाता है और नदियों को ही बांधने का प्रयास करने लगता है। नदियां अपने चीरहरण का प्रतिकार करती हैं। अपनी पुरानी जमीन पर क्लेम करती हैं, अपनी मालिकाना हक का इस्तेमाल करती हैं और अंत में आदमी को अपनी जमीन से बेदखल कर देती हैं। हमारी भाषा ने इस बेदखली के लिए अपनी किस्म का एक शब्द गढ़ा है, जिसका नाम है "बाढ़".

नदियों ने आदमी की सभ्यताओं को अपने सुंदर हाथों से सजाया है इसलिए नदियों और प्रकृति को मनुष्य की जननी कहा गया। हम गंगा को माँ कहते हैं, यमुना को माँ कहते हैं। लेकिन हिंदी के सिरमौर लेखक फणीश्वरनाथ रेणु के साथ ऐसा क्या हुआ कि उन्हें कोसी नदी के लिए "डायन कोसी" नाम से एक बड़ी सी रिपोर्ताज लिखनी पड़ी। रेणु की रिपोर्ताज में साहित्य की दृष्टि से की गई पत्रकारिता को जानने से पहले आज की पत्रकारिता जान लेते हैं

"प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से भारत का हो रहा है नाम। राफेल के आने के बाद थर थर कांप रहा है पाकिस्तान। भव्य मंदिर निर्माण से हर समस्या का हुआ समाधान। एक अभिनेता को न्याय दिलाने के लिए एक पत्रकार ने लगा दिए अपने प्राण। पिछले 50 दिनों की 50 डिबेट्स एक अभिनेता पर चला देने वाला पत्रकार बन चुका है देश का नम्बर वन न्यूज चैनल"

ये थी अपने देश की वर्तमान खबरें। अब आते हैं फणीश्वरनाथ रेणु पर। आज से 72 साल पहले कोशी पर लिखी अपनी रिपोर्ताज में रेणु लिखते हैं।

‘कोसी मैया’ का मन मैला हो गया। कोसी के किनारे रहने वाले इंसान ‘मैया’ के मन की बात नहीं समझते, लेकिन कोसी के किनारे चरने वाले जानवर, पानी पीने के समय सब कुछ सूंघ लेते हैं। नथुने फुला कर वे सूंघते, ‘फों-फों’ करते और मानो किसी डरावनी छाया को देख कर पूंछ उठाकर भाग खड़े होते। चरवाहे हैरान होते। फिर एक नंग-धड़ंग लड़का पानी की परीक्षा करके घोषणा कर देता –

‘गेरुआ पानी!’

‘गेरुआ पानी?’

मूक पशुओं की आंखों में भयानक भविष्य की तस्वीर उतर आती है। गेरुआ पानी, खतरे की घंटी, धुंधला भविष्य, मौत की छाया।

दरअसल जब नदी में बाढ़ आती है तो वह अपने किनारे की मिट्टी काटती चलती है। इस कारण किनारे की मिट्टी नदी के पानी में घुल जाती है। जिसके चलते नदी के पानी का रंग कुछ कुछ मटमैला, गेरुआ हो जाता है। नदी में गेरुआ पानी का आना, बाढ़ आने का सूचक है। यही गेरुआ पानी पिछले 1 महीने से बिहार के एक बड़े क्षेत्र की धरती पर लेटा हुआ है। बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग ने अपने बुलेटिन में बताया है कि वर्तमान में बिहार के 16 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं। बाढ़ प्रभावितों की संख्या बढ़कर वर्तमान में 82.92 लाख पहुंच गई है।

कोसी अकेली नदी नहीं है जिसने बिहार राज्य की कमर तोड़ रखी है। बागमती नदी, बूढी गंडक, कमला बलान, लालबकिया, पुनपुन, अधवारा, खिरोई, महानंदा और घाघरा आदि नदियों ने भी बढ़ती बारिश के कारण अपने बाल बिखेर लिए हैं। आप देखिए ये कितने सुंदर नाम हैं पुनपुन, बागमती, कमला, लालबकीया। इन नदियों के नाम जितने सुंदर हैं, उतना डरावना ही इनका गेरुआ रंग है जो बाढ़ की अग्रिम सूचना दे देता है। लेकिन दिल्ली की कॉफीहाउसों में पहिए वाली चेयर पर हिलती ढुलती, पेट हिलाती पत्रकारिता शायद गेरुआ रंग नहीं पहचानती। अगर पहचानती है तो खबर क्यों नहीं लिखती?

बाढ़ की भयावहता हमें सिर्फ मरने वालों की संख्या से ही महसूस होती है। संवेदना व्यक्त करने वाली हमारी आंखों के चौड़ा होने के लिए मृतकों की संख्या का अधिक होना हमारे लिए पहली और अनिवार्य शर्त है। और बिहार में बाढ़ से अभी तक सिर्फ 27 लोगों की मौत हुई है। इसलिए ये विषय हमारी अटेंशन लेने के लिए पर्याप्त योग्यता नहीं रखता। लेकिन केंद्र सरकार को तो ये समझना चाहिए कि बाढ़ केवल बिहार में नहीं है, ये स्थिति केवल बिहार की ही नहीं है। बंगाल की भी है, उत्तरप्रदेश की भी है, आंधप्रदेश की भी है, असम की भी है। 

वर्तमान में देश के 11 राज्य बाढ़ से प्रभावित हैं। 11 राज्यों के 183 जिले। ये कितनी बड़ी संख्या है! लेकिन इसके अनुपात में इसकी खबरें कहाँ हैं? इसकी खबरें आखिर कहाँ खर्च हो रही है? गृह मंत्रालय के ही अपने ताजा आंकड़ों के अनुसार अभी तक 1 करोड़ 50 लाख लोग बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। गृह मंत्रालय के ही आंकड़ों के अनुसार ही बाढ़ के कारण अब तक करीब 919 नागरिकों की मौत हो चुकी है।

सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य असम है। जहां 5000 से अधिक गांव प्रभावित हैं। असम के बाद नम्बर आता है बंगाल का। बंगाल में 2000 से अधिक गांव प्रभावित हैं।

बाढ़ प्रभावित जिलों की संख्या के लिहाज से मध्यप्रदेश सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है। मध्यप्रदेश में इस समय 40 जिले बाढ़ से अफेक्टेड है वहीं असम में 30 जिले बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं और बंगाल में 23 जिले  बाढ़ से प्रभावित हैं।

ये कितनी भयावह स्थिति है। लेकिन इसकी खबरें कहाँ हैं? बाढ़ पर खबरें ही नहीं होंगी तो नेता पर दबाव कैसे बनेगा? मुख्यमंत्री पर दबाव कैसे बनेगा? हमें सोचना चाहिए कि जिन मुद्दों पर हमारा एंकर बात कर रहा है वे हमारे कितने काम की है, जिस हिंदी को हमने टीआरपी में पहले नम्बर पर पहुंचाया है उसने पिछले 50 के 50 शो एक अभिनेता पर किए हैं। 

इसपर और अधिक बात करने के बजाय आपको रेणु की "कोसी डायन" रिपोर्ताज पर वापस ले जाना चाहता हूँ। रेणु लिखते हैं "मालूम नहीं, कोसी मैया कब अपने मायके पहुंचेगी, मायके से मतलब पश्चिम बंगाल से, समंदर से है, मैया के मायके पहुंचने की उम्मीद में कोसी अंचल की जनता बैठी हुई है। क्योंकि गुस्सा शांत होने पर, जब वह उलट कर देखेगी तो धरती फिर जिंदा हो जाएगी, फिर सोने की वर्षा होगी! बस, यही एक आशा है जिस पर वे मर-मर कर जिए जाते हैं। 

साल में छह महीने बाढ़, महामारी, बीमारी और मौत से लड़ने के बाद बाकी छह महीनों में दर्जनों पर्व और उत्सव मनाते हैं। पर्व, मेले, नाच, तमाशे! सांप पूजा से लेकर पक्षियों की पूजा, दर्द-भरे गीतों से भरे हुए उत्सव! जी खोल कर गा लो, न जाने अगले साल क्या हो। इसलिए कोसी अंचल में बड़े-बड़े मेले लगते हैं। इनकी उम्मीदें देखिए, इनकी आशाएं देखिए-

"काला-आजार में जिसके चारों जवान बेटे मर गए, उस बूढ़े किसान को देखिए, कार्निवल के अड्डे पर चार आने के टिकट में ही ग्रामोफोन जीत लेने के लिए बाजी लगाता है, वह जवान विधवा कलेजे के दाग को ढंकने के लिए पैरासूट का ब्लाउज खरीद कर कितना खुश है! इलाके का मशहूर गोपाल अपनी बची हुई अकेली बुढ़िया गाय को बेच कर सपरिवार नौटंकी देख रहा है… लल्लन बाई गा रही है, ‘चलती बेरिया नजर भरके देख ले।’

जिन्दे नरकंकालों की टोली फिर से अपनी दुनिया बसाने को आगे बढ़ती है। मेरा घर यहां था… वहां तुम्हारा… पुराना पीपल मेरे घर के ठीक सामने था… देखो, न मानते हो तो नक्शा लाओ… अमीन बुलाओ, वर्ना फौजदारी हो जाएगी… फिर रोज वही पुराने किस्से। जमीन सूखने नहीं पाती कि बीमारियों की बाढ़ मौत की नई-नई सूरतें लेकर आ जाती है। मलेरिया,काला-आजार, हैजा, चेचक, निमोनिया, टायफॉइड और कोई नई बीमारी जिसे कोई डाक्टर समझ नहीं पाते। न कोसी का कोप शांत होता और न अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर मोटी सुर्खियां ही लगतीं और कोसी मैया के मन का मैल बढ़ता ही जाता। प्राइमरी स्कूल के पंडितजी पत्रकारिता का परिचय देते हैं। इस बार उनके संवाद को अवश्य स्थान मिलेगा, संपादकजी! कोसी अंचल की त्रस्त जनता की पुकार। भीषण बाढ़ की आशंका। सरकार शीघ्र ध्यान दे।

1948 में कोसी डायन को लिखने के बाद फणीश्वरनाथ नाथ रेणु साल 1977 में दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन उनकी रिपोर्ताज को न जाने कब तक quote किया जाता रहेगा। बात खत्म करने से इस पूरी कहानी की दो बातों को दोहराकर नमस्कार कहूंगा एक ये कि एक चैनल, देश का नम्बर वन हिंदी न्यूज चैनल बन चुका है। न्यूज चैनल, जिसने पिछले 50 दिनों, 50 बहसें एक अभिनेता और उसकी गर्लफ्रैंड पर खर्च कर दीं। दूसरी बात ये कि प्राइमरी स्कूल के पंडितजी पत्रकारिता का परिचय देते हैं।, संपादकजी! कोसी अंचल की त्रस्त जनता की पुकार। भीषण बाढ़ की आशंका। सरकार शीघ्र ध्यान दे।


Post a Comment

0 Comments