मीडिया जिस तरह से खुलकर जनता के खिलाफ और सरकार के साथ है, वह अभूतपूर्व तो है ही, देश के लिए आत्मघाती भी है


कृष्णकांत 

ये अनोखा लोकतंत्र है जहां पूरा सिस्टम सिर्फ एक तरफ है. सरकार कृषि से जुड़े तीन विधेयक लाई है. देश के किसान इनका विरोध कर रहे हैं. विरोध लंबे समय से चल रहा है और कई राज्यों में है. इसे देखते हुए विपक्षी दल भी किसानों के साथ आ गए हैं. 

प्रधानमंत्री अपने नये कानून के फायदे गिनाते हैं और मीडिया उन्हें भरपूर जगह देता है. लेकिन वही मीडिया किसानों के विरोध को, उनकी चिंताओं को, बिल की आलोचनाओं या ​कमियों को वैसी जगह नहीं देता. बिल में क्या गड़बड़ी है, किस बात का विरोध हो रहा है, ये जानने के लिए आपको किसी कृषि विशेषज्ञ को खोजना पड़ता है या छोटी-छोटी वेबसाइट का सहारा लेना पड़ता है.  

इसके पहले सीएए के मामले में भी यही हुआ था. ज्यादातर मीडिया ने ये तक नहीं पूछा कि भारत के संविधान में धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान कैसे किया जा सकता है? 

मुझे कई बार लगता है कि हमारी सरकार किसी चुनी हुई सरकार की तरह नहीं, बल्कि एक माफिया गिरोह की तरह काम कर रही है, जहां दूसरा कोई पक्ष ही नहीं है. 

मीडिया जिस तरह से खुलकर जनता के खिलाफ और सरकार के साथ है, वह अभूतपूर्व तो है ही, देश के लिए आत्मघाती भी है. राजनीति, कॉरपोरेट और मीडिया के इस गठजोड़ के भयानक नतीजे होंगे.


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