ध्रुव गुप्त का लेख: कैसे हो ईश्वर ?


ध्रुव गुप्त 

हम अक्सर उदास, दुखी और परेशान रहते हैं बावज़ूद इसके कि हमारे आसपास एक बड़ी दुनिया है। खूबसूरत प्रकृति है। सुख बढ़ाने और दुख बांटने वाले लोग हैं। आंखें खुली हों तो हर तरफ फैला प्रेम है, करुणा है, ममता है। क्या हमें कभी उसकी भी चिंता हुई जो इतनी बड़ी कायनात का रचेता और मालिक होने के बावज़ूद किसी अनंत आकाश में अकेला पड़ा है। या हमारे आसपास ही मौज़ूद है और उसे हम महसूस नहीं करना चाहते। या शायद हम सबके भीतर ही किसी कोने में उपेक्षित पड़ा है जिसकी आवाज़ हमने कभी नहीं सुनी। ! हमारी उससे अनंत अपेक्षाएं हैं। हम उसे याद करते हैं तो कुछ मांगने के लिए। उसके आगे गिडगिड़ाते हैं तो अपनी कोई ज़िद पूरी करवाने के लिए। 

किसी का भला करते हैं तो यह सोचकर कि ईश्वर हमारा भला करेगा। उसके मंदिर-मस्जिद बनाते हैं तो इसलिए कि मरने के बाद वह अपने काल्पनिक स्वर्ग या जन्नत के दरवाज़े हमारे लिए खोल दे। जैसी हर पिता को अपनी संतानों से होती है, ईश्वर को भी तो हम सबसे कुछ अपेक्षाएं होंगी ? 

हममें से कोई है जिसने अपने भीतर झांककर या अपने आसपास उसे महसूस कर अपने पूरे जीवन में एक बार भी अपना दुखड़ा सुनाने के बज़ाय ख़ुद ईश्वर से उसका हालचाल पूछा हो ? कभी पूछकर देखिए, समूची सृष्टि ही नहीं आपका अंतर्मन भी उसके उल्लास से भर जाएगा।

तू ख़बर रखता है हर हाल में दुनिया की, ख़ुदा   

कभी बता कि तू किस हाल में, कहां, क्या है !


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