किंग लियोपॉल्ड जैसे क्रूर शासक आज भी नफरत के इस ‘भाव’ से अछूते हैं?


वसीम अकरम त्यागी 

यूरोप के बेल्जियम देश की आबादी आज एक करोड़ 15 लाख है। अफ्रीकी देश कोंगो बेल्जियम के किंग लियोपॉल्ड द्वितीय की निजी जागीर जैसा था। जब पश्चिमी दुनिया के देश रबर के लिये जंगलों की खाक छान रहे थे, बेल्जियम का किंग लियोपॉल्ड कोंगों देश के नागरिकों को ग़ुलाम बनाकर उनका खून चूस रहा था। 

इसका सबसे बड़ा कारण था कोंगे के जंगलों में पैदा होने वाले वे पेड़ जिनसे रबर निकाली जाती थी। कांगो के पास तांबा, हाथी दाँत, और रबर का अकूत भंडार था। बीबीसी के मुताबिक़ अगर नैतिकता के मुद्दे को किनारे कर दें तो इसका सीधा सा जवाब था, किसी शहर में सशस्त्र लोगों को भेजो, महिलाओं और बच्चों को अगवा करो और अगर फिर भी पुरुष पर्याप्त रबर न ला पाएँ तो किसी के हाथ काट दो या फिर उसके किसी रिश्तेदार की जान ले लो।

किंग लियोपॉल्ड ने एक तरफ़ तो इसकी लूट शुरू कर दी और दूसरी तरफ़ कांगो के लोग सज़ा, यातना और शोषण से बचने के लिए मजबूर होकर काम करने लगे। निर्धारित मात्रा से कम रबर इकट्ठा करने वाले या काम छोड़कर भागने वाले मजदूरों के हाथ-पाँव काट देना आम सज़ाएँ हो गई थीं। कभी-कभी तो घरवालों, पूरे कबीले या फिर गाँव के गाँव उजाड़ दिए जाते थे।" किंशासा में बीबीसी संवाददाता रहे मार्क डमेट ने साल 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था, "किंग लियोपॉल्ड ने अपनी ईएलसी को एक बहुत बड़े लेबर कैंप में बदल दिया था। यहाँ से रबर इकट्ठा करके उसने अकूत दौलत जुटाई,  लेकिन यहां उसने तकरीबन एक करोड़ मासूम लोगों की जान ले ली।

अब आप इस पोस्ट की शुरुआती पंक्ती को पढ़िए। बेल्जियम की आबादी एक करोड़ 15 लाख है। लेकिन इसी देश के राजा ने अफ्रीका को कोंगों में एक करोड़ लोगों की जान लीं थीं। आज यूरोपीय देश ‘आतंकवाद’ को एक धर्म विशेष से जोड़ते हुए भाषण देते हैं, और मानवता की दुहाई देते हैं। हद तो यह है कि आज भी यूनान में 29 मई को काला दिवस के तौर पर मनाया जाता है क्योंकि उस दिन उस्मानी शासकों ने कुस्तुनतुनिया को फतह किया था। लेकिन अपने ही देश के शासकों द्वारा दूसरे देशों, महाद्वीपों में जाकर आतंक मचाने, जिंदगी को खत्म करने पर नहीं किया जाता?  

जब जब इतिहास के क्रूर शासकों, ओपनिवेशों का जिक्र होता तब तब चंगेज़ ख़ान, तैमूर लंग का आदि का जिक्र बड़ी नफरत के साथ किया जाता है। लेकिन किंग लियोपॉल्ड जैसे क्रूर शासक आज भी नफरत के इस ‘भाव’ से अछूते हैं। जब जब किसी प्रोटेस्टेंट द्वारा इस्लामिक आतंकवाद शब्द बोला जाता है तब तब मुझे रोमन एंपायर द्वारा मानवता पर किये गए अत्याचार याद आ जाते हैं। तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद आज है, लेकिन किसका अतीत रक्तरंजित नहीं रहा? इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाता?


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