तुम्हारी बर्बादी की दास्तान भी लिखेंगे ये अध्यादेश


युसूफ किरमानी 

शहरों में रह रहे लोग इस बात को समझ क्यों नहीं रहे हैं कि किसानों को बर्बाद करने के लिए लाये गए तीनों अध्यादेश दरअसल उनके खिलाफ भी है।

मैं आपको बताता हूँ कैसे...

आलू, प्याज समेत तमाम सब्ज़ियाँ और अनाज की जैसे ही नई फसल आती है, ये सब चीज़ें सस्ती हो जाती हैं। क्किसान अपनी फसल को मंडी में लाकर बेचता है क्योंकि उसे अपनी पैदावार का फ़ौरन दाम चाहिए होता है। 

अगर इन्हीं सब्ज़ियों और अनाज को जब बड़ी कंपनियाँ सीधे किसानों से ख़रीदेंगी तो वे उसे स्टोर करेंगी और जब इनकी क़िल्लत बढ़ेगी तो वो कंपनियाँ इसे महँगे दामों पर बेचेंगी। उनके ख़रीदार शहरों में बैठे लोग हैं जिन्हें मजबूरन बहुत महँगे दामों पर उन्हें ख़रीदना पड़ेगा। वो पैसा कंपनियों की जेब में जायेगा। 

जो तीन नये अध्यादेश लाये गये हैं उनके मुताबिक़ जमाख़ोरी अब अपराध नहीं है। बड़ी कंपनियाँ चाहे जितना अनाज, सब्ज़ी स्टोर करेंगी तो वह अब अपराध नहीं माना जाएगा। यह एक तरह से कंपनियों को कमाई के मनचाहे अवसर देना भी है।

अभी भी कुछ बड़े व्यापारी कोल्ड स्टोरेज में आलू और प्याज स्टोर करते हैं और बाद में उसे महँगे दामों पर बेचते हैं। किसानों से दो और पाँच रूपये में आलू ख़रीदकर उसे चालीस रूपये तक बेचा गया है। क्या सरकार ऐसे बड़े व्यापारियों को इस जमाख़ोरी और मनमानी से रोक पाई।

यह ठीक है कि तमाम कंपनियाँ शुरूआत में किसानों को अच्छा पैसा देकर उनकी फसल ख़रीद लेंगी लेकिन क़रीब एक साल बाद किसान उन कंपनियों की शर्तों पर फसल बेचते नज़र आयेंगे। इसे इस तरह समझिए - आपको रिलायंस के सस्ते जियो डेटा की अादत डलवाई गई। और अब आपको जियो महँगा डेटा बेच रहा है, जिसे ख़रीदना आपकी मजबूरी बन गया है। जियो की वजह से सरकारी क्षेत्र की दो कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल को बर्बाद कर दिया गया। निजी क्षेत्र की भी बड़ी कंपनियाँ जियो का मुक़ाबला नहीं कर पा रही हैं।

अगर सरकार किसानों के साथ है तो वह अपनी कंपनी बनाकर खुद क्यों नहीं सारी फसल ख़रीद लेती? सरकार अपने अध्यादेश में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रही है? सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम किस इरादे से बदला है?

इसमें आपकी ग़लती नहीं है। जिस मीडिया की ज़िम्मेदारी आपको सचेत करना और किसानों के साथ खड़े होने की है, वो सरकार की गोद में जा बैठा है। बड़े बड़े अख़बारों में और टीवी चैनलों में पेड मीडिया किसानों को समझाने में लगा है कि कैसे तीनों अध्यादेश किसानों के फ़ायदे में है? कैसे किसान रातोंरात मालामाल हो जायेंगे? याद रखिए जब पूँजीपति सत्ता के साथ मिलकर हमें लूटता है तो वह हर हथियार का इस्तेमाल करता है। पेड मीडिया या सरकार के विज्ञापनों पर पलने वाला मीडिया आपके हित की बात क्यों करेगा?

हक़ीक़त ये है कि ये पूरा गोदी या पेड मीडिया सारे समस्याओं की जड़ बन चुका है। जब तक इसकी विश्वसनीयता छिन्न भिन्न नहीं होगी, यह बर्बाद नहीं होगा, तब तक सरकार जनविरोधी फ़ैसले लेती रहेगी। किसान कल अपने ट्रैक्टरों पर चढ़कर चंडीगढ़ से दिल्ली के लिए कूच करने वाले हैं, देखना है हरियाणा की खट्टर सरकार किस तरह उन्हें रोकती है?


Post a Comment

0 Comments