"काम में गुणवत्ता की कमी के चलते, CM योगी ने 1 हजार सरकारी कर्मचारियों को दिखाया बाहर का रास्ता"


श्याम मीरा सिंह 
यूपी सरकार ग्रुप बी, ग्रुप सी की सभी भर्तियां कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर करने का प्रस्ताव तैयार कर रही है, जिसके 5 साल खटने के बाद आपको नौकरी पर परमानेंट किया जाएगा। नए मसौदे के अनुसार इन 5 सालों में हर 6 महीने पर कर्मचारी के काम का असेसमेंट किया जाएगा। इस असेसमेंट में एक परीक्षा भी कराई जा सकती है, जिसमें न्यूनतम 60 फीसदी अंक पाना जरूरी होगा।
इस असेसमेंट में 60 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले कर्मचारी हर 6 महीने पर नौकरी से छांट दिए जाएंगे। और इन प्रोबेशनर कर्मचारियों को वे वेतन और सुविधाएं भी नहीं दी जाएंगी जो परमानेंट कर्मचारियों को दी जाती हैं। मतलब इन नए कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की हालत, परमानेंट कर्मचारियों के सामने दोयम दर्जे के नागरिकों जितनी होगी। भले ही नए कर्मचारी बराबर घण्टे काम करेंगे।
सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से कर्मचारियों की दक्षता बढ़ेगी। इसके साथ ही नैतिकता देशभक्ति और कर्तव्यपरायणता के मूल्यों का विकास भी होगा। और सबसे महत्वपूर्ण बात की इससे सरकार पर वेतन का खर्च भी कम होगा।
सरकार का वेतन खर्च भी घटेगा... ये कितना निर्मम और असंवेदनशील तर्क है, सरकार दीपोत्सवों, कुम्भ मेलों, हेलीकॉप्टर खरीदने और कार्यालय बनाने में फिजूलखर्ची कर सकती है लेकिन बची खुची नौकरी के पूरे पैसे देने के खर्च में कटौती करना चाहती है। अगर सरकार का यही तर्क है तो उसे एक सुझाव है, वेतन में पैसे कम करके पैसे क्यों बचाना, इससे अच्छा है कि सरकार नौकरियां निकाले ही नहीं। इससे अच्छा है कि सरकार नागरिकों को "आत्मनिर्भर" बनने के लिए अच्छे अच्छे स्पीच तैयार करवाए, उन्हें सभी नागरिकों की कॉलरट्यून पर लगा दे, इससे भी अच्छा है कि सरकार चीन-पाकिस्तान बॉर्डर की एचडी वीडियोज तैयार करवाए और हर सुबह नागरिकों के व्हाट्सएप पर भेज दिया करे।
इसमें खर्च भी कम आएगा, और नागरिक भी व्यस्त रहेंगे, उन्हें भी ये अहसास रहेगा कि देश में कुछ तो हो रहा है। व्यस्त रहेंगे तो उन्हें ये अहसास कभी नहीं आएगा कि मोहल्ले का गौरव, मनोज, आशुतोष जिस सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है पिछले पांच सालों से उसमें भर्तियां ही नहीं निकलीं। निकलीं हैं तो टेस्ट नहीं हुआ, टेस्ट हो गया तो रिजल्ट नहीं आया। रिजल्ट आया तो वरिष्ठ नेता जी से जुगाड़ लगा के कोई युवा छात्र नेता ही उस नौकरी को जुगाड़ ले गया।
अगर राजकोषीय खर्च बचाना है तो आईटी सेल का बजट बढ़ा दें, अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन दें, नौकरियां निकालने के मैनेजमेंट से अच्छा है सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट करें, अखबार मैनेजमेंट करें। इससे नागरिकों में भी अहसास बना रहेगा कि इसबार कुछ यूनिक शासन आया है।  कोई तो है जो मजबूत फैसले ले रहा है, कोई तो है जो शख्त फैसले ले रहा है।
ऐसा कहा जाता है कि एक तानाशाह ने कभी कहा था कि जनता को इतना निचोड़ दो कि वो अपने जीने को ही विकास समझे। ये बात उस तानाशाह ने कही थी या न कही थी मालूम नहीं। लेकिन भारतीय जनता पर एकदम फिट बैठ रही है।
सरकार जिसे सरकारी कर्मचारियों के काम में गुणवत्ता कह रही है उसे प्रेक्टिकल जीवन में लिखी समाज शास्त्र की किताबों में "बंधुआ मजदूरी" कहा जाता है। इस नए मसौदे को बातों की चाशनी में जितना चाहे डुबो लीजिए, उसपर चांदी की परत  लपेटकर जितना चाहे परोस लीजिए लेकिन इससे ये सच ये है  कि इन 5 सालों के दौरान कर्मचारी की हालत अपने सीनियर बाबुओं के आगे कृपापात्र जितनी रह जाएगी। जो कर्मचारी सीनियर बाबू के प्यारे होंगे वे नौकरी पा जाएंगे, जिनकी जातियों के बाबू होंगे व्रे नौकरी पा जाएंगे, जिनकी जेब में गांधी जी पर मुस्कुराती नोटों की गड्डियां होंगी वे नौकरी पा जाएंगे।
जो नेता जी के नारे लगाने वाले होंगे वे भी नौकरी पा जाएंगे। लेकिन जो घूस नहीं दे पाएंगे, जो सेम जाति, विचारधारा और चापलूसी में फिट नहीं बैठेंगे ऐसे कर्मचारियों को, उन दस टेस्टों में से, किसी न किसी एक टेस्ट में छांट दिए जाएंगे। और एक ईमेल भेज दिया जाएगा, ईमेल पर लिखा होगा "महोदय अमुक पद पर आपका प्रदर्शन संतुष्टिजनक नहीं रहा, हमारे यहां काम करने के लिए शुक्रिया, धन्यवाद। अमुक तारीख से आपकी सेवाएं समाप्त होती हैं" लेकिन ये कोई नहीं कहेगा कि आपकी जुगाड़ और घुस का स्तर संतुष्टिजनक नहीं रहा, इसलिए अमुक तारीख से आपकी सेवाएं समाप्त होती हैं।
अगले दिन मुख्यमंत्री जी के विज्ञापन के पैसे से चलने वाले अखबार की हेडलाइन होगी "काम में गुणवत्ता की कमी के चलते, मुख्यमंत्री ने 1 हजार सरकारी कर्मचारियों को दिखाया बाहर का रास्ता" टीवी पर लिखा होगा, मुख्यमंत्री जी ने लिया एक और सख़्त फैसला... क्या देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?
एक लोकतंत्र में जनता शासक से सवाल पूछती है कि आपने क्या किय्या? और प्रचारतंत्र में शासक जनता से पूछता है कि आपने देश के लिए क्या किय्या?. उस ईमेल के पीछे की सच्चाई और अखबार की हेडलाइन के अंतर को ही "गोदी मीडिया" कहा जाता है, जिसकी पीठ पर बैठा आपका नेता, धर्म पताका की चमक से आपकी आंखों चकाचोंध पैदा कर देता है....

Post a Comment

0 Comments