GDP में औसतन 10 फीसदी की गिरावट आएगी


सौमित्र रॉय 

सरकारी सिस्टम के भीतर भारतीय अर्थव्यस्था को लेकर भी तरह-तरह से आंकलन किए जा रहे हैं। रिजर्व बैंक गवर्नर शक्तिकांत दास ने भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकर के इस दावे का समर्थन नहीं किया कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में जीडीपी में करीब एक चौथाई की गिरावट आने के बाद अर्थव्यवस्था में वी-आकार (V) में सुधार होने की संभावना है। 

आरबीआई गवर्नर डब्ल्यू (W) आकार में अर्थव्यवस्था में सुधार होने की उम्मीद करते दिखाई दिए, जिसका मतलब है कि कुछ दिन बाद इसमें थोड़ा सुधार होगा लेकिन फिर से इसमें गिरावट आएगी और आगे चलकर 2021-22 के अंत तक अर्थव्यवस्था में पूर्ण सुधार आने की संभावना होगी। कोई भी वास्तव में नहीं जानता है कि अगले एक या दो वर्षों में इसका असली रूप क्या होगा।

कई नामी प्राइवेट शोध संस्थाओं ने अनुमान लगाया है कि वित्त वर्ष 2020-21 में जीडीपी में औसतन 10 फीसदी की गिरावट आएगी. जीडीपी में सिर्फ एक फीसदी की गिरावट का मतलब है कि राष्ट्रीय आय में करीब दो लाख करोड़ रुपये की कमी आना। 

10 फीसदी की गिरावट आने का मतलब है कि 2020-21 में आय में करीब 20 लाख करोड़ रुपये की कमी आएगी। यह भी ध्यान रखें कि ये आंकड़े न्यूनतम हैं। आय में इतनी भारी गिरावट आने और सरकार द्वारा उचित आर्थिक प्रोत्साहन देने में नाकाम रहने के बाद अगले साल मांग में कमी आएगी। 

रोजगार पर भयावह परिणाम होंगे। बेरोजगारी के आकलन की पारंपरिक पद्धति कोविड-19 के बाद पहले जैसी नहीं रहेगी क्योंकि सर्वेक्षणों से पता चलता है कि एक तिहाई से ज्यादा कार्यरत लोगों को सैलरी नहीं मिल रही है और अन्य एक तिहाई को सिर्फ 50 फीसदी सैलरी मिल रही है।

इसे महामंदी के बाद सबसे खराब आर्थिक मंदी के रूप में माना जा रहा है। इसने 1930 और 1933 के बीच अमेरिका में मंदी को और गहरा कर दिया था। भारत की कुल संपत्ति में गिरावट आने की संभावना दिखाई दे रही है क्योंकि आरबीआई ने संकेत दिया है कि कोविड-19 के बाद कुल लोन का करीब 15 फीसदी एनपीए रहेगा। 

जब तक लोन स्थगन और प्रस्तावित 2-वर्षीय ऋण पुनर्गठन की अवधि समाप्त नहीं हो जाती, तब तक हम वास्तविक स्थिति को नहीं जान पाएंगे। मांग बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा उचित हस्तक्षेप न करने और बैंकिग सिस्टम में छिपी कमजोरी- के कारण भारत उसी राह पर है जिस पर महामंदी के पहले चरण के दौरान अमेरिका था। 

भारत इस समय चीन के साथ तनातनी की स्थिति में है इसलिए भविष्य में व्यापार और निवेश की संभावनाओं में कमी आ सकती है। ऐसे में भारत के आर्थिक सुधार में न सिर्फ देरी होगी, बल्कि यह खतरों को और बढ़ाएगा।


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