कोरोना एक ऐसी बीमारी है जिसके 80 प्रतिशत मरीजों को लक्षण उभरते ही नही हैं?


गिरीश मालवीय 

कोरोना एक ऐसी बीमारी है जिसके 80 प्रतिशत मरीजों को लक्षण उभरते ही नही है और यदि उभरते भी है तो बहुत कम, ऐसे लोग या तो स्वमेव ठीक हो जाते हैं या साधारण सर्दी बुखार की दवाइयां खाने से ठीक हो जाते हैं बचे 20 प्रतिशत में से 15 प्रतिशत लोग डॉक्टर की सहायता से बिना हस्पताल जाए भी सही हो सकते हैं कुछ केसेस में हस्पताल जाना रिकमंड किया जाता है केवल 5 प्रतिशत मरीजो की ही गंभीर बीमार पड़ने की आशंका है

अब ऐसी बीमारी का आप टीका बना रहे हैं तो क्या ये नही माना जाएगा कि 80 प्रतिशत सफ़ल तो आप ऐसे ही मान लिए जाओगे ?

कोई भी वैक्सीन निर्माता दावे के साथ अभी तक यह नही कह रहा है कि हमारी वैक्सीन लगने के बाद आपको कोरोना होगा ही नही !.......ऑक्‍सफर्ड-एस्‍ट्राजेनेका की वैक्‍सीन जहां ओवरऑल 70.4% असरदार बताई जा रही हैं वहीं बाकी फाइजर, मोडर्ना ओर रूस की गामिलिया इन तीनों का सक्‍सेस रेज 94% से ज्‍यादा बताया जा रहा है ...... आपको बता दूं कि ऑक्‍सफर्ड का टीका भी खास डोज पैटर्न पर ही 90% तक असर करता है। 

वैसे भारत सरकार का मूड अभी आक्सफोर्ड वाली वैक्सीन के इस्तेमाल का लग रहा है केंद्र सरकार कहती है आंकड़ों के अनुसार भारत में कोरोना से रिकवर होने वालों मरीजों का प्रतिशत 93.58% है। अच्छी से अच्छी वैक्सीन की सफलता दर भी इतनी ही है .......वैक्सीन निर्माता सिर्फ ये कह रहे हैं कि उनकी वैक्सीन लगने के बाद बीमारी की तीव्रता कम हो जाएगी

अब कोरोना टीकाकरण प्रोग्राम इतना नजदीक है तो वैक्सीन के साइड इफेक्ट क्या होंगे ये प्रश्न भी उठना स्वाभाविक ही है सरकार कह रही है कि कोरोना वैक्‍सीन लग जाने के बाद वह लोगों की मॉनिटरिंग करेगी। ऐसा इसलिए ताकि वैक्‍सीन की सुरक्षा को लेकर लोगों में भरोसा बढ़ सके

लेकिन जिस तरह से जल्दबाजी में यह टीका लाया जा रहा है उससे कई सवाल खड़े होते हैं विज्ञान विश्व से परिचित सभी मित्र जानते हैं कि किसी भी बीमारी का टीका कम से कम 7 वर्षों में ही बनता है जब कोरोना का हल्ला मचा था तो यह कहा गया कि इसके टीके को बनने में मिनिमम डेढ़ साल लगेगा अब यह 8 से 10 महीने में ही तैयार कर लिया गया है तो उसकी सुरक्षा पर प्रश्न तो खड़े होते ही है

इतिहास बताता है कि अब तक जितनी बार भी ऐसी जल्दबाजी मचाई गयी हैं परिणाम उल्टे ही आए हैं पोलियो की वैक्सीन का ट्रायल serious adverse event (SAE) का एक उदाहरण है. साल 1951 में पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक Jonas Salk को पोलियो का टीका बनाने के लिए फंडिंग मिली. कुछ ही महीनों में उन्होंने दावा कर दिया कि टीका बन गया है. कई सारी दवा कंपनियों को वैक्सीन का लाइसेंस मिल गया. Cutter Laboratories भी इनमें से एक थी. 165,000 वैक्सीन डोज “POLIO VACCINE: RUSH” लिखकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिए गए. कुछ ही हफ्तों में नकारात्मक रिपोर्ट्स आने लगीं. ये अप्रैल 1955 की बात है. इसकी वजह से 70 हजार से ज्यादा लोग हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए. कई मौतें हुई. वैक्सीन पर रोक लगा दी गई और दोबारा सारे ट्रायल हुए, इसके बाद वैक्सीन मार्केट में आई.

इसी तरह से साल 2016 में डेंगू के लिए एक वैक्सीन Dengavxia तैयार करने की कोशिश की गई. लेकिन इसके कारण डेंगू प्रभावित लोगों की हालत और खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई.

उपरोक्त कम्पनियों ने कोरोना टीके के तीसरे चरण के ट्रायल कुछ सौ लोगो पर ही किये हैं इसलिए हमें इन सफलता परिणामो को संदेह की दृष्टि से देखना होगा अतः कोरोना वैक्सीन के मामले में बहुत सोच समझ कर कदम उठाने की जरूरत है


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