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यूपी की राजनीति में एंटी मुस्लिम टोन से भरा है विरासत और माफ़िया का ज़िक्र

यूपी की राजनीति में एंटी मुस्लिम टोन से भरा है विरासत और माफ़िया का ज़िक्र

 


रवीश कुमार

सोमवार के प्राइम टाइम को लिखते समय बार-बार एक चीज़ नज़र से टकरा रही थी कि वो क्या चीज़ है जो दिख तो रही है लेकिन साफ-साफ नहीं दिख रही है। कुछ था तो छूट रहा था। मैं इस दुविधा से गुज़र रहा था कि यूपी की राजनीति में माफ़िया और विरासत शब्द का क्या मतलब है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से कई ख़बरें छपी है कि माफ़िया का सफ़ाया हो गया। इस माफ़िया से किसे टारगेट किया जा रहा है। उसी तरह से विरासत का ज़िक्र किन संदर्भों में आ रहा है, इसके इस्तमाल से क्या कहने से बचा जा रहा है और क्या कहा जा रहा है। प्राइम टाइम के ख़त्म होने के बाद तक इस सवाल से टकराता रहा। समय की कमी के कारण माफ़िया को छोड़ दिया लेकिन विरासत को समझने लगा। उसमें भी कई चीज़ें साफ़ होने से रह गईं जो यहां लिखने की कोशिश करना चाहता हूं।


विरासत और माफिया के इस्तमाल के ज़रिए यूपी की चुनावी राजनीति में धर्म को ठेला जा रहा है। जिस विरासत से अभी तक मिली-जुली संस्कृति की पहचान होती थी उस पहचान से विरासत को अलग किया जा रहा है। अरबी के इस शब्द को विकास से जोड़ कर जो खेल खेला जा रहा है उसे समझने के लिए आपको प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के भाषणों की कॉपी पढ़नी चाहिए। 


महंगाई और कोराना के दौर में आम जनता में यह संदेश गया कि बीजेपी धर्म की राजनीति में उलझाए रखती है इसलिए बीजेपी धर्म को इस बार विरासत के नाम से पेश कर रही है। ऐसा नहीं है कि उसके भाषणों में राम मंदिर का खुलकर ज़िक्र नहीं है लेकिन विरासत के बहाने वह अपनी धर्म की राजनीति को नए सिरे से मान्यता दिलाने की कोशिश कर रही है। जैसे टूथपेथ का नया ब्रांड आता है तो वह कुछ नए शब्दों के साथ आता है उसी तरह धर्म की राजनीति विरासत का कवच ओढ़ कर आ रही है जिसमें एक ही धर्म से जुड़ी विरासतों की चर्चा है। 


प्रधानमंत्री के काशी में दिए गए लंबे भाषण का टेक्स्ट पढ़ रहा था। भोजपुरी, संस्कृत और संस्कृत निष्ठ हिन्दी के सहारे वे अपने भाषण में बहुत कुछ सवालों के जवाब देने से बच गए। गौरव और परंपरा के विशेषणों से इतना भर दिया कि काशी कॉरीडोर के लिए तोड़े गए सैंकड़ों घरों और मंदिरों का सवाल कहीं गूंजता ही नहीं। मंदिर को मॉल बना देने पर करोड़ लोगों को लग सकता है कि विकास हुआ है क्योंकि समाज इसी तरह से धारणाओं के बीच जीता है। घर में खाने को नहीं है लेकिन शादी का सेट इस तरह से तैयार कर दिया जाएगा जैसे फ्रांस का वर्साय महल दूल्हे के बाप का ही है। अपनी वास्तविकता से अतिरिक्त और अतिरंजित वास्तविकता में जीने वाले इस समाज के लिए इन चीज़ों का कोई महत्व नहीं है कि काशी कारिडोर के लिए पुराने पुराने मंदिर और स्मारक क्यों तोड़े गए। क्या मंदिर के रास्ते को चौड़ा करने के लिए कोई और विकल्प नहीं था? 


इस बात को लेकर बनारस में ही बहस कुछ लोगों की होकर रह गई और शहर ने पल्ला झाड़ लिया। धरोहर बचाओ का आंदोलन ठंडा पड़ गया। बनारस ने इसकी चर्चा तो सुनी मगर चर्चा नहीं की। आँखों से देखते रहे लेकिन ज़ुबान से बोलना भूल गए। शायद यही वजह है कि अब बनारसीपन की बात बंद हो चुकी है। जब नज़र ही नहीं आएगी तो बात क्या होगी। औघड़पन और अल्लहड़पन बनारसीपन का हिस्सा नहीं रहे। वो अब लेखों और झूठे भाषणों में नज़र आते हैं।बनारसीपन का मतलब हो गया है सहना और चुप रहना। बिना डरे बोलने की जगह बोलते हुए डरना नया बनारसीपन है। एक धर्म और एक राजनीति की तरफ से कमज़ोरों को ललकार देने का साहस तो होगा ही लेकिन उस एक धर्म और एक राजनीति के भीतर ग़लत को ग़लत बोलने का साहस अब बनारस में नहीं है। काशी के अतीत में जीने वाला बनारस ख़ुद अतीत हो चुका है। उसे अब बनारस को देखने के लिए चौराहों पर लगी एल ई डी स्क्रीन के पास जाना पड़ता है।

 

बहरहाल इस विषयांतर से लौटते हुए मैं विरासत और माफिया के चुनावी प्रयोग पर आना चाहता हूं। प्रधानमंत्री के भाषण में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का ज़िक्र वही चालाकी है जो ए पी जे अब्दुल कलाम को अच्छा मुस्लिम बताती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की कॉपी में बनारस का वह हिस्सा ग़ायब है जिससे कोई बिस्मिल्लाह ख़ान निकलता है। जिसकी शहनाई की धुन एक मुसलमान की बजाई शहनाई है बल्कि उसमें उसमें उस बनारस का राग है सदियों के दौरान सबके मिलने से बनता है। हम उन धुनों से विरासत के नाम पर कुछ सदियों को अलग नहीं कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषण में काशी और उसके समानांतर पूरे भारत से जिन प्रतीकों को चुनते हैं उससे प्राचीन भारत के नाम पर एक बड़े भारत को अलग कर देते हैं। काशी की प्राचीनता सुदूर अतीत के प्राचीन भारत के कालखंड तक सीमित नहीं है। वो याद भी करते हैं तो औरंगज़ेब के संदर्भ में। प्रधानमंत्री के लिए विरासत हिन्दू धर्म का नया पर्यायवाची बन गया है। इसके लिए वे विरासत से एक बड़े हिस्से की विरासत को विस्थापित कर देते हैं। लोगों को निकाल दो, उनके शब्दों को रहने दो। 


काशी के बाद गोवा जाते ही प्रधानमंत्री मिली-जुली संस्कृति की बात करने लगते हैं। काशी के भाषण में एकाध पंक्ति में निपटा देते हैं कि विभिन्न मत-मतांतर के लोग आते हैं। गोवा जाते ही पोप फ्रांसिस की बात करने लगते हैं। गोवा में मिली-जुली संस्कृति के लिए पोप फ्रांसिस नाम गर्व से लिया जाता है। बहरहाल, वोट के लिए काशी और गोवा के बीच प्रधानमंत्री कैसे बदल जाते हैं, इसे जानने के लिए नरेंद्र मोदी का काशी और गोवा में दिया हुआ भाषण सुन सकते हैं। इस सूची में काशी के बाद शाहजहांपुर का भाषण भी जोड़ लीजिए। मेरी गुज़ारिश है कि PIB और प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर मौजूद भाषण की कॉपी पढ़िए। 


विरासत को विकास से जोड़ा जा रहा है। यह केवल व से विकास और व से विरासत की सतही तुकबंदी नहीं है बल्कि एक समुदाय के साथ साथ रोज़गार और महंगाई के मुद्दे के समुदाय को भी बाहर कर देने की जुगलबंदी है। बहुत चालाकी से विरासत हिन्दू धर्म के विकल्प में आ रहा है,अभी धीरे-धीरे जगह बना रहा है लेकिन चुनाव नज़दीक आते ही विरासत अपना चोला उतार फेंकेगा और हिन्दू हिन्दू करने लगेगा। अभी के लिए विरासत के सहारे मुस्लिम विरोधी टोन से बचा तो जा रहा है लेकिन विरासत के इस्तमाल से उस टोन की चादर बिछाई जा रही है जिस पर खुलकर लाउडस्पीकर दहाड़ने वाले हैं।


मुझे यूपी की अपराध की दुनिया की जानकारी नहीं है। मसलन किस इलाके में किस माफिया का किन चीज़ों पर कब्ज़ा है। शिक्षा का माफिया अलग होता है। रेत का अलग होता है। खनन का अलग होता है।परिवहन का माफिया अलग होता है। क्या ये सारे माफिया यूपी से ख़त्म हो गए हैं? प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हर भाषण में माफिया और कट्टा के इस्तमाल से किसकी याद दिला रहे हैं? सीधे सीधे नाम लेकर बोलने की जगह अपराध के बहाने क्या वे केवल कानून व्यवस्था की बात कर रहे हैं? तो फिर क्या वे इस पर बोलना चाहेंगे कि अगर इतनी ही अच्छी व्यवस्था थी तो लोगों पर ग़लत तरीके से रासुका क्यों लगाई गई? हाथरस में बलात्कार पीड़िता के शव को उसके ही घर के आंगन में नहीं रखने दिया गया और रात के वक्त अंतिम संस्कार कर दिया गया। माफिया अगर पुलिस में नहीं होता तो कानपुर के व्यापारी मनीष गुप्ता की हत्या नहीं होती। माफिया अगर राजनीति में नहीं होता तो पुलिस के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या के मामले में इंसाफ़ मिल गया होता।


अगर माफिया के इस्तमाल में बीजेपी का मुस्लिम विरोधी टोन नहीं है तो मेरा एक सवाल है। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या प्रधानमंत्री अपने किसी एक भाषण में विकास दूबे के सफाये का ज़िक्र कर देंगे? क्या विकास दूबे माफ़िया नहीं था? माफिया की सफाई हुई है तो दो चार के नाम लेकर भी बोले जा सकते हैं ताकि पता चले कि माफिया का इस्तमाल चुनावी वोट साधने के लिए नहीं हो रहा है। वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि तब विकास दूबे के ज़िक्र से वोट बैंक बिगड़ जाएगा। उनके भाषणों से कभी साफ नहीं होता कि माफिया कौन है,किस किस माफिया का सफाया कर दिया लेकिन माफिया को लेकर संदर्भों के जाल इस तरह से बुने जाते हैं कि दिखने लगता है कि माफिया कौन है। वह कोई मुसलमान है। क्या माफिया का एक ही धर्म होता है? या तरह-तरह के माफिया तंत्र की दुनिया में एक ही धर्म के लोग हैं? 


विरासत और माफिया केवल एंटी मुस्लिम शब्द नहीं हैं बल्कि एंटी नौकरी एंटी महंगाई भी है। कोरोना की दूसरी लहर के तांडव का तो ज़िक्र ही नहीं हो रहा है। सारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि  विरासत और माफिया अगर चल गए तो यूपी के नौजवानों को संविदा की नौकरी देकर उनमें गर्व का हवा भर दिया जाएगा। वे फूले फूले से नज़र आएंगे और फूले भी न समाएंगे।

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